Sunday, April 2, 2017

फुटनोट 93

यह बात शायद 1988 के आस-पास की कभी की है. बस में धर्म-कर्म की बात हो रही थी, हर बात पर टांग अड़ाने की आदत से मजबूर मैं भी कुछ-कुछ कहने लगा. एक दूसरे के धर्म को छोटा दिखाने वाली बहस में उलझे दोनों ने एक साथ पूछ दिया कि मेरा ईमान क्या है? मैंने कहा मेरे पास ईमान ही ईमान है. दोनों ने कहा वो वाला नहीं, मजहब वाला, मैंने कहा वह तो ईमान नहीं बेईमान है और दोनों मुझसे एक होकर बहस करने लगे.

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