Tuesday, March 21, 2017

फुटनोट 92 (नौकरी)

1975-76 में जब लगा कि क्रांति अभी अगले चौराहे पर नहीं है (70 का दशक मुक्ति का दशक) और श्रम बेचने को अभिशप्त हैं तो काफी सोचने के बाद लगा यही एक नौकरी (मास्टरी) है जो मैं करना चाहूंगा. लेकिन रंग-ढंग ठीक किए नहीं, जब लगा अब बाकी ज़िंदगी कलम की मजदूरी से गुजारनी पड़ेगी कि कई संयोगों का सुखद संगम हो गया. अब तो 2 साल में नौकरा से रुख़सती है लेकिन ईमानदारी से कहता हूं कि देर से मिलने का कोई शिकवा नहीं, मिल जाने को सौभाग्य मानता हूं और उन संयोगों और व्यक्तियों का आजीवन आभारी रहूंगा, जिनके चलते मिल गई. बाकी दो सालों के मास्टरी के सुख का भरपूर उपभोग करना चाहता हूं. वैसे तो जो तेवर से मास्टर हो वह आजीवन मास्टर बना रहता है, बंद कमरे में न सही, खुले आसमान के नीचे. हा हा. मुझे हमेशा लगता रहा है कि यदि आधे शिक्षक भी शिक्षक होने का महत्व समझ लें तो एक पुल तैयार कर सकते हैं जिस पर चलकर अगली पीढ़ियां नए द्वीपों का अन्वेषण कर सकें, लेकिन दुर्भाग्य से हम महज नौकरी करते हैं.

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