Saturday, February 4, 2017

फुटनोट 88 (बुज़ुर्गी)

मैं तो भाई बच गया. मैंने तो 25 के बाद साल ही गिनना बंद कर दिया, लोगों के बुजुर्गियत की गरिमा की बारंबार याद दिलाने और नाना बन जाने के बावजूद मैं गरिमामय नहीं हो पाता, वैसे कभी परखने की कोशिस भी नहीं की. वैसे अंकगणित के हिसाब से शायद तुम्हारी सूची की पहली कोटि में आऊं क्योंकि मैं तो महीनों पहले इकसठिया चुका लेकिन जिनसे सावधान रहने की युवाओं को सलाह दी है उन कोटियों में कहीं फिट नहीं पाता.(आत्ममुग्धता का हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है) जिस दिन लगेगा जिंदगी जी चुका, उस दिन मर जाऊंगा. ज़िंदगी जीने का मतलब अपने मूलभूत सैद्धांतिक मान्यता-मूल्यों के प्रति निष्ठा और कथनी-करनी में एका के अनवरत प्रयासों के साथ अंतिम सांस तक जीना है. मुझे तो 18 की उम्र में ज़िंदगी की दूसरी बगावत, पिता से पैसे न लेने का फैसले के बाद पहली बार जिंदगी जीने की शुरुआत का यहसास हुआ. तबसे एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए (एक कदम आगे, 2 कदम पीछे का लेनिन का वक्तव्य खास परिस्थिति में रणनैतिक वक्तव्य था, क्रांति का सार्वभौमिक नियम नहीं) शुरुआत के दिनों के चरण खत्म ही नहीं हो रहे. वैसे तुम्हारी लगभग सब बातों से सहमत हूं, खासकर तथाकथित मार्क्सवादियों को मार्क्स पढ़ने की सलाह पर.

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