Thursday, December 22, 2016

फुटनोट 83 (लेखन)

आप की बात से अंशतः सहमत हूं सरकारी वजीफे-पुरस्कार बंद हो जाएं तो 75% लेखक लिखना बंद कर देंगे. % विवाद का विषय है. मुझे लिखना दुनिया का सबसे मुश्किल काम लगता है, लेकिन मन को समझाता हूं कि आसान काम तो सब कर सकते हैं. बेरोजगारी तो नहीं कहूंगा वरना सारे स्वरोजगारी बेरोजगार हो जाएंगे. होजाएंगे क्या हो रहे हैं. नोटबंदी ने लेबर चौराहों को सुनसान श्मसान बना दिया है. दिल्ली विवि परिसर में रिक्शा वालों की तादाद ज्यादा-से-ज्यादा 25% रह गयी है. सब वापस बिहार अपने-अपने गांव भाग गये, जहां यदि रोजी रोटी का जुगाड़ होता तो मलीन बस्तियों में रहकर घोड़े का श्रम करने दिल्ली क्यों आते. परिहार्य फुटनोट की मॉफी. तो मैं कह रहा था कि बेनौकरी के दिनों में 'बिन मांगे; चुराए; धुके' ज़िंदगी जीने की जिद ने कलम की मजदूरी से घर चलाने के आर्थिक दबाव में लिखना पड़ता था और अब जनपक्षीय लेखन क्षमता के बावजूदो न लिखने के सामाजिक अपराध से बचने के नैतिक दबाव में. वैसे कोई भी संतोषजनक लेख (कविता नहीं, क्योंकि कभी कभी कलम की आवारगी में लिखा जाती हैं और मैं उन्हें उस कोटि की नहीं पाता, जैसी कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगती हैं) पूरा करने के बाद उतनी ही खुशी होती है, जितनी किसी भगवान-भक्त को चारों धाम का तीर्थ करने से और छपने के बाद उसनी जितनी भक्त को भगवान के साक्षात दर्शन से. पाठकों और मित्रों की प्रशंशा से उतना सुख मिलता है जितना शायद द्वापर के युधिष्टर को कुत्ते के स्वर्ग जाने पर मिली हो (तुलनाएं अनुमानजन्य है). जितना लिख सकता था/हूं तथा लिखना चाहता हूं, व्यक्तित्वगत अव्यवस्था, आवारगी और अराजकता के चलते न लिख पाने के अपराधबोध के साथ जीता हूं. उम्मीद करता रहता हूं कि पाप का घड़ा कभी तो भरेगा. कलम के आवारगी का आलम यह कि आज एक लेख की डेडलाइन है और 2 लाइन का कमेंट लिखते-लिखते छोटा लेख लिखा गया. ग्राम्सी ने कहा है कि हर व्यक्ति में बुद्धिजीवी होने की संभावनाएं होती हैं लेकिन कम लोग ही उसे कार्यरूप दे पाते हैं. बहुत कम लेोग लिख पाते हैं, उनमें बहुत कम अच्छा लिख पाते हैं. अच्छा लिख सकने वालों में बहुत ही कम लोग जनपक्षीय परिप्रेक्ष्य से लिख सकते हैं, जो लिख सकते हैं और नहीं लिखते वे सामाजिके गुनहगार हैं. इसलिए न लिख पाने का अपराधबोध. तो यार मैं जो लिख सकूं, छपता रहे तो मैं जब तक कलम चलाने का सामर्थ्य रहेगा, कलम चलाता रहूंगा, बिना किसी मान-सम्मान; पुरस्कार-भुगतान के लिखता रहूंगा. मिलता है तो बोनस. अब आप मुझे 25% में रख देंगे. हा हा.

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