Saturday, October 15, 2016

फुटनोट 79

आज सुबह से खाने-पीने, अखबार पढ़ने के अलावा कुछ नहीं किया, आवारागर्दी नऔर अड्डेबाजी भी नहीं, न आभासी दुनिया में, न वास्तविक. वैसे कुछ न करना एक अमूर्त कल्पना है क्योंकि यह सत्य है कि यदि आप जीवन जी रहे हैं तो कुछ-न-कुछ कर रहे हेैं, क्या कर रहे हैं, अलग बात है और ज्यादा महत्वपूर्ण. हां यह कह सकते हैं कि आज कुछ लिखा-पढ़ा नहीं, या कि कुछ ठोस नहीं किया. जब लगता है कि आप कुछ नहीं कर रहे हैं तब सबसे महत्वपूर्ण काम कर रहे होते हैं -- चिंतन, जिसके फैरी फायदे भले न दृष्टिगोचर हों, लेकिन दूरगामी अर्थों में दिमागी व्यायाम कभी व्यर्थ नहीं जाता. कुछ मत करिए, कुछ भी करिए, सोच-विचार कर.

Didn't do anything the whole day since morning except tea-breakfast-lunch and reading the newspapers, not even the vagabondism or addebaji, neither in the virtual world nor in the real. Though no doing anything or doing nothing is an abstract imagination. By virtue of the fact that you are living, you are acting any way. What is important is, your action must be well thought. When you think you are doing nothing, may be you are doing more important things contemplating and meditating over things, thinking or retrospecting. There may not be immediate visible gains but in a long term perspective exercise of the mind never goes waste. Don't just act, your action must be well thought.

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