Monday, September 5, 2016

फुटनोट 74 (ब्राह्मण)

कुंदल जी, बिल्कुल सही कंह रहे हैं. होता क्या है कि रीतियों और परंपराओं का बोझ सामान्य लगने लगता है और हम उसे उतार फेंकने की बजाय, हम ढोते रहते हैं. एक तो शरीर के निकृष्ट अंग के रूप में शरीर को गति देने वाले अंग, पैर .गलत है. सम्मान की अभिव्यक्ति के जनतांत्रिक तरीके क्यों न अपनाए जाएं. उस थ्रेड पर मेरे 3 विद्यार्थियों ने कमेंच किया है, सम्मान की कमी नहीं दिखती. भाई विरोधी गालियां तो देगा ही. वो अमन ही क्या वो चमन ही नक्या दुश्मन जिसमें ताराज न हो. मैं बार बार कहता हूं कि मैं ब्राह्मण का नहीं ब्राह्मणवाद का आलोचक हूं लेकिन तमाम पांडे, मिश्रा, शुक्ला.. त्रिशूल लेकर पिल पड़ते हैं. एक बात बताइए, कोई भी विवेकशील व्यक्ति जन्मजात असमानता के सिद्धांत की प्रणाली को जायज ठहरा सकता हो. वर्णाश्रम की वृद्धों के प्रति क्रूरता देखिए, जब देख-भाल की जरूरत होती है तब वृद्धों को वानप्रस्थ्य की व्यवस्था है. मुझे नहीं लगता किसी और समुदाय में विधवा आश्रम का विधान होगा? मुझे यह भी नहीं लगता कि अपनी विधवाओं के प्रति कोई और समुदाय इतना अमानवीय होगा. जैसे ही ब्राह्मणवाद की आलोचना करो, सब पूछने लगते हैं, मिश्र क्यों लिखते हो? अरे भाई मिश्राओं को वैज्ञानिक सोच विकसित करने की मनाही है क्या? तर्क नहीं होता तो कॉरपोरेटी सामाजिक न्यायवादी भी यही सवाल पूछते हैं.

लिखता ही रहेगा मेरा कलम हरफ-ए-सदाकत
रोक नहीं सकती इसे ज़ुल्मत की कोई भी ताकत
लिख रहे हों जब दानिशमंद सज्दों का अफसाना
लिखना ही है मेरे कलम को बगावत का तराना
बन रही हो ग़र सर झुकाके चलने की रवायत
लाजिम है बचाना सर उठाके चलने की आदत
फिरकापरस्त कहर से बचाना है गर कायनात
रोकना होगा शेख-बिरहमनों की फरेबी खुराफात
अंधेयुग के किलेदार से न होगा मेरा कलम भयभीत
बेख़ौफ लिखता रहेगा इस अंधेयुग के बेबाक गीत
(बस यों ही कलम फिर आवारा हो गया)
(ईमि: 05.09.2016)

No comments:

Post a Comment