Monday, January 25, 2016

फुटनोट 64

पद्म पुरस्कारों की बात तो कभी सोचा नहीं लेकिन दिल्ली विवि में नौकरी योग्यता से नहीं मिलती. कभी कभी नौकरियों के ठेकेदारों को योग्य शिष्य भी भा सकते हैं. जरूरी नहीं कि जुगाड़/चमचागीरी से नौकरी पाए लोग योग्य न हों. शैक्षणिक योग्यता अतिरिक्त योग्यता बन जाती है. मुझे भी प्रकारान्तर से जुगाड़ से ही नौकरी मिली. १९८१-८२ में पहले इंटरविव तथा दिसंबर ,१९९५ स्थाई नौकरी मिलने के बीच मेरी शैक्षणिक योग्यता में ४-५ शोधपत्रों के अलावा कोई वृद्धि नहीं हुई. और १९९० में वाम-दक्षिण हितों के टकराव के संयोग से मिली एक साल की नौकरी छूटने के बाद तो बच्चे बड़े हो रहे थे, खर्च बढ़ रहे थे, कलम की मजदूरी (लेख, रिपोर्ट, समीक्षा, सेरियल, डाक्यूमेंट्री, अनुवाद आदि) से घर चलाने मेंविषय कीपुस्तकों से दूर रह कर शैक्षणिक अयोग्यता ही अर्जित किया. वाम-दक्षिण हितों के समझौते नौकरी जाने वाला मेरा साक्षात्कार सर्वाधिक संतोषजनक था क्योंकि मेरीनैतिक लड़ाई थी. मुझे २-३ महीने पहले ही पता हो गया था कि मेरी नौकरी एक बहुत बड़े आदमी के प्रतिभाशाली बेटे के लिए फिक्स हो गयी थी. अंततः संयोगों के टकराव से नौकरी का जुगाड़ बन गया. मनिवन्नन मेरा पुराना दोस्त टीचर-इंचार्ज था. पुराने प्रिंसिपल रिटायर हो गए थे नए की नियुक्ति नहीं हुई थी. वरिष्ठतम शिक्षक मान्धाता ओझा कार्यवाहक प्रिंसिपल थे जो मुझसे मिलने के पहले से ही जनसत्ता तथा दिनमान में मेरे लेखों से परिचित थे. एक्सपर्ट के रूप मेरी नौकरी जाने में १/५ अपराध कबूल कर चुकीं, सुशीला कौशिक विभागाध्यक्ष थीं तथा मुझे लगता है उसी समय रिटायर हुए केके मिश्रा के प्रयास से यसके चौबे एक्सपर्ट थेजिनकीकिताबमैंने सम्पादित की थी तथा उनके असोसिएट के तौर पर ICSSR JOURNAL OF ABSTRACTS AND REVIEWS का एक बैकलाग अंक भी अकेले दम पर निकाला था. इसतर जुगाड़ हो गया. मुझे नौकरी न मिलाने मे मेरे गवांरू अहंकार का भी योगदान था जिसे मैं स्पष्टवादिता समझता था.

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