Thursday, December 17, 2015

फुटनोट 59

बिल्कुल सही कह रहे हैं नीलाभ भाई कि क्रूरता हर युग में रही है. कई बार हॉब्स की मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों के अपने खंडन पर संदेह होता है. आदिम समाज में जब पाने-खोने को कुछ नहीं था तब भी क्यों लड़ते थे तथा एक दूसरे को प्रताड़ित करते थे. लेकिन प्रेम तथा सहयोग के जीवन की कहानियां क्रूरता तथा वर्चस्व की कहानियों से बहुत अधिक हैं, सहयोग से साझी मुश्किलों से आसानी से लडा जा सकता है. मुझे लगता है कि मनुष्य में स्वार्थी तथा लड़ाकू प्रवृत्ति की शुरुआत पशुधन के रूप में संपत्ति के आगाज़ के बाद हुई.मेरी सीमित जानकारी राहुल तथा एंगेल्स के ही लेखन पर ही आधारित है. सही कह रहे हैं कि उसके पहले लोग आहार, पानी तथा स्त्री के लिए लड़ते थे. 40 साल पहले पढ़ी वोल्गा से गंगा की पहली कहानी के दृष्य स्मृति में अब भी सजीव हैं. यही महान रचना का गुण है. कई बार सोचा कुछ कहानियांं दुबारा पढ़ूं, लेकिन अभी तक ऐसा न हो पाया.

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