Tuesday, November 24, 2015

फुटनोट 55

जातिसूचक गालियों का ही नहीं नारीविरोधी गालियों के भी उग्र प्रतिरोध की निरंतरता की अावश्कता है. जिस संस्कृति में गाय की कीमत इंसानकी जान की कीमत से ज्यादा हो, उस संस्कृति को समूल नष्ट करना है. ऐसा सामाजिक चेतना के जनवादीकरण से ही संभव है. सारी जनतांत्रिक तथा समानता की पैरोकार ताकतों की एकजुटता की दरकार है. सवर्णवादी हिंदुत्व-भूमंडलीय पूंजी का भयानक गठजोड़ बहुत बडा खतरा है. मिलकर ही लड़ना होगा. संख्याबल को जनबल में बदलना होगा.

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