Sunday, September 13, 2015

फुटनोट 49

सही कह रही हो, Neelima Chauhana, लोग बेटों के आर्थिक भविष्य के लिए उतने ही चिंतित रहते हैं जितना बेटियों की शादी के. बेटे हैं नहीं तथा न तो कभी बेटियों के आर्थिक भविष्य की चिंता की न शादी की. उनसे कभी पूछा ही नहीं कि क्या बनना चाहती हैं. मैें over caring, over protection, over expectation by parents के शिकार बच्चों की दशा देख over caring के विपरीत uncaring का आसान रास्ता अपनाया. हा हा. जब बेटियां स्कूल में थीं तो पत्नी चिंता करती थीं कि बेटियां क्या करेंगी. मैं कहता था रोजी रोटी के लिए ईश जैसे लोग भी कुछ-न-कुछ कर ही ले रहे हैं तो वे भी कर लेंगी(कर रही हैं), एक अच्छे इंसान बनने में उनकी मदद करें बाकी अनचाहे उपपरिणामों की तरह अपने आप साथ हो लेंगे.

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