Wednesday, September 23, 2015

फुटनोट 50

चंद्रभान जेयनयू में तथा उसके बाद भी हमारा मित्र होता था. 1983 में निष्कासन की कीमत पर न मॉफी मांगने वाले 17-18 लोगों में हमारे साथ था. दरबार लगाने के शौक, चंदनमित्रा, सरदेसाई, प्रभुचावला जैसों की संगत की चाहत आदि की आर्थिक मजबूरियों के चलते, लगता है, वह अंतरात्मा के सौदे को मजबूर हो गया तथा ब्राह्मण-दलित स्वाभाविक गठजोड़ का सिद्धांतकार हो गया. मेरे साथ अंतिम संवाद लगभग उसी समय का है जब भाजपा समर्थन से मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं थीं.

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