Saturday, April 11, 2015

फुटनोट 29 (शिक्षा अौर ज्ञान 53)

Zakir Hussain अापने सही कहा राष्ट्रवाद एक अाधुनिक विचारधारा है जिसकी उत्पत्ति यूरोप में पूंजीवाद की राजनैतिक अभिव्यक्ति राष्ट्र राज्य के उदय के साथ हुई. हिंदोस्तान तथा अन्य अौपनिवेशिक देशों में इसकी उत्पत्ति उपनिवेशवाद विरोधी विचारधारा के रूप में हुई. जहां साम्राज्यविरोधी राष्ट्रवाद जहां एक भौगोलिक इकाई को राजनैतिक इकाई में तब्दील करने में लगे थे वहीं साम्राज्यवादी दलाल इसे विकृत कर हिंदू-मुस्लिम राष्ट्रवाद की परिभाषा गढ़ने में लगे थे जिसका परिणाम साझे भूगोल ही नहीं इतिहास के अनैतिहासिक बंटवारे में हुई, जिस घाव के नासूर रिसना नहीं बंद हुये, कभी कश्मीर में खून टपकता है तो कभी दिल्ली में; कभी हाशिमपुरा में तो कभी वेल्लोर में; कभी गुजरात में तो कभी मुज़फ्फरनगर में; मोदी ने कहा वे हिंदू राष्ट्रवादी हैं अौर लोगों के अाराध्य बन गये. अगर अाप अंतस या शक्ति या सुनील मौर्य को जानते हों तो उन्हें मैंने अभी राष्ट्रवाद पर 1983 के अपने 1 लेख की कॉपी दिया था जब वे दिल्ली अाये थे. नवउदारवादी राष्ट्र पर बहुत दिनों से लिखने का इरादा है, लेकिन  वक्त नहीं मिला. जल्द लिखूंगा. किसी संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा है नारों का चुनाव अौर समझ. कोई अापके नारे का मतलब पूछे तो अाप उसे समझा सकें न कि गाली गलौच करने लगें. मैं बहुत धैर्यवान शिक्षक हूं जो सभी विद्यार्थियों में क्रांतिकारी संभावनायें पाता हूं, जिन्हें विवेकसंगत समाजीकरण की जरूरत है.  मैं अक्षय से पहले भी पूछ चुका हूं तथा इस पर लेख का वायदा कर चुका हूँ,जो पूरा करना ही है. सामंती शासन की विचारधारा धर्म था. पूंजीवाद की विचारधारा राष्ट्रवाद है. @अालोक अनिकेत -- अापके बाकी सवालों का जवाब बाद में दूंगा, यहां केवल कविता की प्रासंगिकता की बात करूंगा, अाधुनिकता ने मानव-इतिहास के साथ जो फरेब किया है अनमें राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद की अमूर्तता भी  है. 11 पेप्सी प्रचारक अाईपीयल में नीलाम होने वाले लड़के खराब खेले तो "पाकिस्तान ने हिंदुस्तान को धूल चटा दिया". वगैरह. दुबारा पढ़ लें.

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