Sunday, January 25, 2015

फुटनोट 28 (अलौकिकता)

Shashank Shekhar तुम बहुत चालू हो. हर सुबह मेरे चंद जिज्ञासु शिष्यों की तरह ईश्केवर जी के चक्कर में  उलझा देते हो कि बुड्ढा शायद मरा मरा करते करते राम राम करने लगे. लेकिन यह बुड्ढा बहुत ढीठ है. "प्रेम का उल्लेख इसलिए किया कि ये जब जीवन में हो तो कृतज्ञता का भाव आता है, जिसका आलम्ब ईश्वर है l ऐसे और भी भाव हैं जो अलौकिकता का भान कराते हैं ... शायद आपको भी कुछ याद आये" मित्र, भाग्यशाली रहा हूं कि बचपन से ही प्रचुरता में प्रेम मिलता रहा. लेकिन अलौकिक नहीं, लौकिक कारणों से. कुछ भी मुफ़्त में नहीं मिलता. अर्जित करना पड़ता है. प्रेम-सम्मान अर्जित करना पड़ता है तथा पारस्पारिकता की बुनियाद पर टिकता है. इश्क कहे जाने वाले प्रेम के बारे में, नो कमेंट. "न सवाल करो, न झूठ सुनो" क्योंकि  समाज की नैतिक सुरक्षा का मामला है. मैं प्रेम में कृतज्ञता नहीं पारस्परिकता-भाव के अानंद का अनुभव करता हूं. कृतज्ञता या किसी अन्य मानवीय/मनोवैज्ञानिक बोध/भाव का अवलंब या अाधार अलौकिक नहीं लौकिक, मानवीय होता है.कृतज्ञता में सहानुभूतिक भाव की प्रधानता होती है तथा पारस्परिकता में समानुभूतिक.अब अाता है मामला पक्षधरता(subjective stand) का तो मैं समानुभूति को श्रेष्ठतर मानता हूं. अलौकिकता के अनुभूति/भान के सवाल पर अात्म कथा के अंश के लिये उकसा दिया. कोई अगर कहता है, "तुम्हारे स्टूडेंट्स तुम्हारी बहुत इज्जत करते हैं (तुम लोग मिलोगे किसी सो तो तुम भी यही कहोगे, हा हा खुद की पीठ ठोंक लो, हा हा. क्यों नहीं, कुछ भी खैरात में नहीं मिलता, कमाना पड़ता है) तो मैं "सो  नाइस ऑफ देम" नहीं कहता, कहता हूं तो कौन सा एहसान करते हैं, मैं भी तो उनकी इज्जत करता हूं. अपार अानंद की इस अनुभूति के अलौकिक नहीं लौकिक कारण हैं. ओह, यह तो लंबा लेख होता जा रहा है. कोई बात नहीं, बात चल ही पड़ी है तो बढ़ने दो. मेरे पुराने स्टूडेंट्स जब मिलते हैं तथा मित्रवत व्यहार की कृतज्ञता का इज़हार करते हैं तो मैं उन्हें कहता हूं कि इसमें कृतज्ञता की कोई बात ही नहीं है क्यों कि ऐसा मैं विवेकसम्मत स्व-हित(स्वार्थ नहीं, स्वार्थ विवेक सम्मत नहीं होता) में करता हूं. पहली बात तो उन्होने मेरी फसल नहीं काटा है कि शत्रुवत व्यहार करूं. दूसरी बात ज़िंदगी का मकसद महज़ जीना नहीं है, सुखमय ज़िंदगी जीना है. यह सुख मात्रात्मक नहीं गुणात्मक अवधारणा है. यहां फिर सब्जेक्टिव फैक्टर अा जाता है. मेरी अनुभव-जन्य मान्यता है कि सुख के सहीं अर्थों में, किसी भी संबंध का, (किसी भी तो किसी  भी) वास्तविक अानंद तभी मिलता जब रिशताः 1. जनतांत्रिक 2. समतामूलक (समता मात्रात्मक इका ई नहीं गुणात्मक अवधारणा है), 3. पारदर्शी हो. पारस्परिक सम्मान इसका उपपरिणाम है. ये सारी लौकिक अनुभूतियां हैं, अलौकिक नहीं. चलो फ्लैश बैक में चलता हूं.लगभग 27 साल पहले मेरे बहुत प्रिय, मुझसे 10-11 साल छोटे,22 साल के भाई की लखनऊ विवि के हॉस्टल में, सोते में, हत्या हो गयी.अद्भत बालक था. कुश्ती का चैंपियन तथा यम.ए. टॉपर. दिल्ली से लखनऊ की सड़क मार्ग से यात्रा में कई बार मन में अाया, काश, कोई अलौकिक शक्ति होती अौर कोई चमत्कार हो सकता. लेकिन मैं जानता था कि कोई अलौकिक शक्ति नहीं होती न चमत्कार हो सकते थे. मेरे बाकी भाई सामान्य हो गये क्योंकि उन्होने अलौकिकता में शांत्वना ढूंढ़ लिया मैं 5-6 महीने विक्षिप्त रहा, लौकिक कारण ढूढने में. मुफ्त में कुछ नहीं मिलता. कीमत चुकानी पड़ती है. बचपन में अलौकिकता के अमूर्त भय और भान की कहानियां अगली कड़ी में.  

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