Tuesday, January 20, 2015

फुटनोट 26

Shashank Shekhar नकारात्मकता अौर पर-निर्भरता को मैंने ईश्वर का मर्सिया पढ़ते हुये 17 साल की उम्र में जला दिया था. जिंदगी में दुख के क्षण पूछते तो सोचता, याद ही नहीं हैं. अपनी शर्तों पर जीने के जुनून के संघर्ष प्रतिकूलताओं को blessing in disguise में तब्दील करना सिखा देते हैं. सोच-समझ कर, चुने गये कष्ट के रास्ते दुख नहीं अद्वितीय सुख अौर अद्भुत अात्मबल देते हैं. अात्मालोचना के लिये साहस की जरूरत होती है. ईश्वर क्या है. अमूर्त लफ्फाजी नहीं, ठोस परिभाषा. यहां तो उसके बारे में जिनी राय दिख रही हैं वह अंधों की हाथी की व्याख्या है. ईश्वर कितना खतरनाक है कि तुम्हारे जैसे व्यक्ति भाषा असंयमित कर देता है. प्रमोद सिंह जैसी तमीजदार भाषा पर कोई कमेंट नहीं. बस इतना ही कहना चाहूंगा कि निराधार निजी अाक्षेप जहालत की पहली निशानी है.

No comments:

Post a Comment