Thursday, September 25, 2014

फुटनोट १९

Shailendra Singh शुक्रिया. समाज बहुत से लोगों से ही नहीं  बहुत तरह के लोगों से मिल कर बना है. मत-वैभिन्य स्वाभाविक है. कोइ अंतिम सत्य नहीं होता मतभेदों के शालीन टकराव से ही सापेक्ष सत्य निकलता है और देश-काल के हिसाब से खुद को बदलता रहता है. "पर उपदेश शकल बहुतेरे"  वाली प्रजाति आत्म-प्रवंचना की शिकार होती है क्योंकि वह अपने अलावा सभी को बुद्धू समझती है और शिष्टाचार में समय बर्बाद करती है. शिक्षक और माँ-बाप को दृष्टांत देकर ही नहीं बनकर भी पढ़ाना होता है. शिक्षा और प्रवचन में फर्क होता है. 

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