Tuesday, August 5, 2014

फुटनोट 14

Shashank Shekhar  मित्र मैं हवा में नहीं बात करता हूं 1968 में मैंने जनेऊ तोड़कर ब्राह्मण अस्मिता से विदा लिया लेकिनव मूर्खतापूर्ण हिंदुत्व के चक्कर में पड़ गया. मैं सारी बातें अनुभव और शोध से कहता हूं. मैं खो और कबड्डी के चक्कर में एक सीनियर के चक्कर मे गया और वीरेश्वर नाम का एक हरामजादा, धोती धारी प्रचारक था. य़मटेक का टॉपर. य़े सागे हरामजादे किसी के ट़पर का परिचय देते हैं.  इलाहाबाद में एक भटुकेश्वर जी था वह भी यमटेक का टॉपर था. इन तानों ने मुझे अपना चाल में फंसाने की कोशिस की. फिर मैंने 25-30 बाल स्वयंसेवकों से बात की. शुकर है कि तुम बालस्वयंसेवक नहीं थे नहीं तो यह स,वाल न पूछते. वह कुत्ता बटुकेश्वर मेरे पैर पर पड़कर रो रहा था कि उसकी हरकतों को सार्वजनिक न करूं. 1976 में ग़ाजियाबाद में बटुकेश्व मिला, सरकागी इंजीनियर था. अगर सारे नहीं तो बहुमत संघ के अधिकारियों का चरित्र बाल शोषण का है. संघी इन्हें कार्यकर्त्ता नहीं अधिकारी कहते हैं. ्पवाद नियम की पुष्टि करते हैं.

गुस्सा तो अब तक आया नहीं. मैं तो संघी प्रचारकों का शोध एवं अनुभवजन्य तथ्य बता रहा हूं. मैं सारे संघियों को चुनौती देता हूं कि अगर वे बालस्वयंसेवक रहे हैं तो ईमानदारी से बतायें कि किसी अधिकारी ने उनका शोषण किया कि नहीं. 

Pramod Kumar Singh  अगर आप दिमाग गिरवी रख कर सोचेंगे तो ायेंगे कि कितनी खोखली सामाजिक सणझ है. मैं जानता नहीं लेकिन कह सकता हूं कि आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे होंगे. मैं आपकी तरह अफवाहजन्य ज्ञान का बात नहीं करता, तथ्यें-तर्कों की कसौटी पर परख कर करता हूं. 

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