Thursday, June 12, 2014

फुटनोट 1

Ujjwal Bhattacharya  उज्जवल दा, यह पारिवारिक हिंसा नहीं, क्रीड़ा होती थी जिसमें वह मेरी थपकी को मारना समझ, सूद समेत भरपूर घूसे से वापस करती थी. बड़ी बहन से लड़ाई में वह तो बच्ची समझ आहिस्ता से मारती थी और यह पूरी ताकत से. एक बार मैंने पूछा तुम उसे इतनी जोर से क्योें मारती हो तो बोली मुझसे जब धीरे नहीं मारा जाता तो। वैसे भी वह मेरी दादी की छत्रछाया में रहती थी, जिनके संरक्षण का कवच जब हम बच्चे थे तो हमारो पिताजी-दादाजी का क्रोध भी नहीं पार कर पाता था. दादी कहा करती थीं कि "बच्ची है, मरवाय ल तनकी" और एक बार जब उनको एक दिया, तब बोलीं कि लगती है. ये अब 2 दशक से अधिक पुरानी बात हो गयी.

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