Tuesday, July 30, 2013

मुहब्बत नहीं है मात्रात्मक इकाई


मुहब्बत नहीं है मात्रात्मक इकाई कोई
मुहब्बत है एक गुणात्मक अवधारणा
जो न नापी जा सकती है
न  ही मिलती उपहार में
मुहब्बत होती है अनादि और अनंत
बढ़ती है साझा करने से ज्ञान की तरह
नष्ट होती है संचय से ज्ञान की ही तरह.
[ईमि/३०.०७.२०१३]

अंतरंग पारस्परिकता



अंतरंग पारस्परिकता
प्यार है नाम अंतरंग पारस्परिकता का
पारदर्शी  समझ और घनिष्ठता का
प्यार करता है पथ प्रशस्त आपसी प्रगति का
 सरोकारों की साझी संस्कृति का
कर दे जो प्यार बर्बाद
वह प्यार नहीं, है विशुद्ध अवसरवाद.
[ईमि/३०.०७.२०१३]

Monday, July 29, 2013

खुदा का जनाजा

खुदा का जनाजा 

शामिल हो कर खुदा के जनाजे में
लगा दोजख-ओ-जन्नत मिल गयी
तैरती हवा में दिखीं जन्नत में  हूरें
दोजख में दिखे इंसान हमारी तरह
खुदा को याद आने लगे अपने पाप
सताने लगा उसको खुदाई जुर्मों का ताप
रह गयी हूरें देख यह अजीब नज़ारा
खुदा ने पकड लिया रास्ता दोजख का.
क्या खुदाओं में भी होती है अंतरात्मा?
या पवाड था यह मर चुका खुदा?
[ईमि/२९.०७.२०१३]

Saturday, July 27, 2013

लल्ला पुराण १०५

संसदीय संविधान पर एक अलग पोस्ट डालने का वायदा जल्द पूरा करूंगा. फिलहाल तो हमारी लड़ाई वंचितों के संवैधानिक अधिकारों के लिए ही है. हमारे साथ बिहार कैडर के सेवा-निवृत्त आईएएस, केबी सक्सेना भी हैं जिनकी ईमानदारी और कर्तव्य-परायणता  बारे में किम्वदंतियां सुनते थे  हम जब इलाहाबाद में पढ़ते थे. वे सिद्धांत में  बिलकुल मार्क्सवादी नहीं  हैं, व्यहार में है क्योंकि उन्होंने पूरे जीवन करनी-कथनी के विरोधाभास के विरुद्ध संघर्ष किया. पूंजीवाद एक दोगली व्यवस्था है, यह जो कहता है, करता नहीं, जो करता है कहता नहीं. यदि राज्य अपने संवैधानिक दायित्व पूरा करे तो जनवाद की दिशा में आधा रास्ता तय हो जाए. हमारे नौकरशाह और पुलिस-सेना अधिकारी यदि राजनैतिक माफिया की चाकरी करने की बजाय अपने संवैधानिक दायित्व पूरा करें तो काफी जनकल्याण वैसे ही हो जाए. सभी उदारवादी (पूंजीवादी पढ़ें) संविधानों में 'संविधानेतर' कानूनों के प्रावधान होते हैं जिनके तहत जनता के संवैधानिक अधिकार मुअत्तल कर दिए जाते हैं. मीसा/टाडा/पोटा/ ...ज्वलंत उदाहरण हैं. इनका सर्वाधिक उपयोग-दरुपयोग अमेरिका में १९५०-६० के दशक में मेकार्तिज्म के ग्ताहत "लाल-शिकार" के नाम पर हुआ और मौजूदा वक़्त में इस्लामोफोबिया के तहत हो रहा है. आदिवासियों/किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल करने के संवैधानिक प्रावधान हैं लेकिन भ्रष्ट और जमाखोर पूंजीपतियों की निजी संपत्ति के अधिग्रहण का कोइ क़ानून नहीं है. आज़ादी के बाद औद्योगीकरण के नाम पर औने-पौने दामों में पूजीपतियों को जमीनें दी गईं और अब जब वे रिहायशी इलाके बन गए तो जमीन वापस लेनी चाहिए लेकिन पूजीपतियों ने उन जमीनों को अरबोब-खरबों के रीअल एस्टेट में तब्दील कर लिया. मौजूदा संघर्ष संवैधानिक अधिकारों का ही है.

International Proletariat 40

No, you should not be deleted for that. In fact as long as some thing does not happen it seems an utopia. The law of dialectical materialism is -- continuous, evolutionary, quantitative changes, maturing into revolutionary, qualitative changes. And no time-scheme can be set for that. Most visible examples in India, since my student days, are Dalit (in US, balck) assertion and scholarship and feminist assertion and scholarship. The changes are still only quantitative, total emancipation from patriarchy and racism has yet to go a long way. The rise of anti-jingoistic and anti-imperialist consciousness in an increasing sections of WORKERS IN the US is also an example of quantitative evolutionary changes, that are bound to lead to revolutionary qualitative changes. The link b/w 'class in itself' to 'class for itself' is most vital. That is the task ahead for us.

लल्ला पुराण १०४





जी हाँ, मुझे भ्रष्टाचार और निकम्मेमन से स्खलित इस देश की असंवैधानिक बन चुकी संवैधानिक व्यस्थाओं में यकीन नहीं है. जितने मशहूर मुठभेड़ विशेश्ग्य हुए हैं ज्यादार या तो जेलों में हैं या आपसी रंजिश में मारे गए जैसे राजबीरआदि . हमने अपनी रेपर्ट आपके विचारार्थ  पेश की है स्वीकृति की अपेक्षा नहीं.

Under which constitution fake encounters take place? SUPREME Court appointed Juatice Bhagvati commission has investigated into 22 fake encounters in Gujarat  alone. Are the Banjaras/Pandeys and other Police officials facing charges were performing their constitutional duties or were serving the personal whims of politicians interested in creating communal polarization  for electoral gains. Yes this verdict is travesty of justice leaving many unanswered questions  raised by us. judges too are human beings and can err. This judgement is based on presumptions and prejudices and not on

श्रीनिवास जी हम लोग अपनी सीमित क्षमता में मानवाधिकार के उल्लंघन के यथा संभव मुद्दों पर स्टैंड लेते रहते हैं और आवाज उठते रहते हैं, काश आप जैसे प्रज्ञावान और निष्ठावान लोग जुड़ते तो इसका प्रभाव क्षेत्र व्यापक हो जाता. जनहस्तक्षेप कम्युनिस्ट संगठन नहीं है  इसके ज्यादातर   सदस्य (मुझे मिलाकर)गैर  कम्युनिस्ट  जनतांत्रिक नागरिक हैं. .

Friday, July 26, 2013

तल्ख़ अलफ़ाज़


तल्ख़ अलफ़ाज़  हैं मेरे पैगाम के
बहुत ही तल्ख़ है अफ़साना-ए-हकीकत
बयान-ए-हकीकत ना-मुमकिन है मृदुभाषिता से
दिखती है मुझे खोट उनकी नीयत में
रहते हैं जो अति-विनम्र, अति मृदु-भाषी लिबास में
[26.07.2013]

लल्ला पुराण १०३

On a link of a report on Batla house encounter in 2008 immediately after posting it on fb. my comments in reply:

Belief is a religious dogma, nothing can be done with reason to that. Please read the report and then comment. Do not make un-thought instant comments on serious issues.

Vibhas Awasthi TAKE PAIN OF READING THE REPORT. INSTANT COMMENT ON SUCH SERIOUS ISSUES ARE NOT APPROPRIATE. ITS LONG REPORT AND WITHIN A MINUTE OF ITS POSTING, YOU BEGAN QUESTIONING THE AUTHENTICITY OF THE REPORT PREPARED BY A GROUP OF ACTIVIST SCHOARS. IF YOU READ THE REPORT YOU WILL FIND THE ARGUEMENTS OF AUTHETICITY WITHIN THE REPORT. COMMENTING WITHOUT READING IS LIKE A KHEINIETE FATAVA

Vibhas Awasthi मैंने आप पर कोइ आरोप नहीं लगाया. २ जाने-माने  मानवाधिकार संगठनों के गंभीर और प्रातिबध शिक्षाविदों-वकीलों-पत्रकारों की टीम जब रिपोर्ट बनाती है तो हवा में नहीं, ठोस तर्कों और तथ्यों के आधार पर.. मैंने आपसे सिर्फ इतनी गुजारिश किया की रिपोर्ट पढ़ कर उसकी प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाएं. और यदि आप प्रकाश की गति से न पढ़ते हों तो यह असंभव है कि पोस्ट करने के एक मिनट के अन्दर आपने पढ़ लिया हो. किसे भी राज्य की न्यायपालिका का वही चरित्र होता है जो राज्य का.

Sorry Vibhas, no intention to hurt you. My insistence on questioning the authenticity of the report after reading it was on the basic assumption that it should be assumed by any rational individual  that if some responsible intellectuals belonging to Democratic Rights Organizations with impeccable credentials of integrity are making a public statement, must be having some basis for their conclusions and a healthy debate could taken place on the facts and arguments provided by us. Without reading the report, only after seeing the title you made comments with implications of doubts on our intellectual integrity. I assumed with my common sense that being a seasoned and senior journalist must be etymologically aware of the  methodology of  fact finding teams. We visited to the places concerned talked to people and officials concerned. The core committee consisted of 2 prominent lawyers of Supreme Court with impeccable integrity; 1 retired  and 3 serving professors  of Delhi University. Many other senior members including the prominent journalist Gautam Navlakha were involved in finalising the report that took over a month. The report was released to media by Justice(rtd) Rajinder Sachchar and prominrnt journalist Kuldip Naiyar.



Thursday, July 25, 2013

International Proletariat 39

The liberal (or formal) democracy is political expression of capitalism -- presently the corporate controlled global capital. The ruling class parties project and propagate their internal, mostly artificial contradiction as the major contradiction of the society  and nation in order to blunt the edge of the real major contradiction -- the contradiction of 1% v/s 99% -- the economic contradiction. For couple of times I followed the presidential debate after almost a year of fund raising campaign from the underground and over ground money mafia -- the corporate-- and on except on minor issues of abortion; gay-lesbian rights and so, there is concurrence of thought and views on all the major issues of domestic and foreign policy issues. The same was true about Tory and the New Labor in England. In India, the internal contradiction of two faithful agents of imperialist global capital led by the US -- the Congress and the BJP has become the major political contradiction projected by all the ideological apparatuses of the state in nexus with and in service of the imperialist global capital to blunt the edge of major contradiction --the contradiction between the Indian people and the imperialist global capital. The present form of the capital is global in the sense that it is no more geocentric either in terms of its source or in terms of investment.

Wednesday, July 24, 2013

लल्ला पुराण १०२

मुझे वाकई  तरस आता है ऐसे पढ़े लिखे जाहिलों पर जो एक फासिस्ट नरपिशाच को देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं जिसने चुनावी फायदे  के लिए हिटलर की तर्ज़ पर नरसंहार और उससे भी दो कदम आगे सैकड़ों सामूहिक बलात्कार ओरायोजित किये हों. आडवानी द्वारा फैलाए गए धर्मोन्माद और साम्प्रदायिक जहर की आग पर जिसने  चुनावी  रोटियाँ सेंक कर कुर्सी हासिल की हो और साम्प्रादायिक ध्रुवीकरण के लिए पुलिस को जरखरीद गुलाम बनाकर फर्जी मुठभेड़ें प्रायोजित किये हों. अपने मानस पिता के लिए भस्मासुर बने इस देशद्रोही, जघन्य अपराधी की  ज़रा एक बात बताइए जो इसे युगद्रष्टा साबित करे. वे पढ़े-लिखे जाहिल भी मानसिक रूप से उसी के बराबर  कमीने नरपिशाच हैं जो इस फासीवादी के महिमामंडक भोंपू बने हैं.. ये जाहिल संघी अपने ही अंतर्विरोधों को राष्ट्रे राजनीति का मुद्ददा बनाने पर तुले हैं. मुकेश जी थोड़ा पढ़ें लिखें, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की गरिमा पर और कालिख न पोतें.

धीरेन्द्र भाई प्रणाम! एक व्यक्ति के हत्यारे को हत्यारा और बलात्कारी को  बलात्कारी कहने में यदि आपत्ति नहें है तो हजारों बेकसूरों की ह्त्या और सैकड़ों महिलाओं के साथ  बलात्कार/ह्त्या के प्रायोजक को नरपिशाच कहना तल्ख़ भाषा कैसे हो गयी. वैसे मैं इलाहाबाद के बाद कई सालों जे.एन.यु. में रहा हूँ, जो अभिव्यक्ति अनुपयुक्त लगे वह समझ लीजिये जे.एन.यु. का प्रभाव है. और किसी  फासीवादी जनसंहार के  प्रायोजक की महिमामंडन करने वालों को जाहिल और नरपिशाच से कम तल्ख़ विशेषण क्या दिया जा सकता है. इससे तल्ख़ भाषा के लिए काश मैं भाषाविद होता या भाषा ही समृद्ध होती.

Tuesday, July 23, 2013

azad

long live the revolution/on this day was born a great revolutionary, Chandrashekhar Azad /whose name was a terror for British empire/He was the Commander oa peoplesf the HINDUSTAN socialist Republican Association/committed to establish a peoples' republic/by eradicating inequality and poverty/ the exploitation of man by man shall be made impossible/fearless revolutionary intellectuals/ Bagvati vohra and Bhagat singh/all of them the born revolutionaries/INQILAB ZINDABAD - long live the revolution/became the new slogan that encompassed  the horizon of the freedom struggle/that hit the HIMALAYA /and the echoes reached the Birmingham Palace/shaking its foundations/they too got bewildered/ who peacefully protested the imperialist plunder/with the rise of stature of the revolutionary party/the imperialist oppression peaked in desperation/after the martyrdom of Bahgavati-Bhagat-Rajguru-Shadev/Azad was contemplating new revolutionary channels/woods of company bagh in Allahabad became his temporary camp/enemy surrounded him with the help of traitors and informers/Azad fought alone the British army for hours and used the last bullet to become martyr himself/Martyrs do not die their ideas inspire the new revolutionary uprisings/long live Comrade Azad/ many red salutes/your campaign of an exploitation free world would go on a long way/future generation would take ahead the fight you began/long live revolution --long live  Chandrshekhar Azad.

औरतें


औरतें
ईश मिश्र
बेडिया तोड़ रही हैं दुनिया की औरतें
मर्दवाद को अब ललकारती हैं  औरतें
सांस्कृतिक संत्रास  देती हैं औरतें
भोग्य-पूज्या नहीं अब बनतीं ये औरतें
किफायती कपड़ों में खोमैनी को चिढाती औरतें
गोमती से वोल्गा तक घूमती हैं औरतें
फूल से अंगार बन रहीं ये औरतें
शब्दों को औज़ार बनाती हैं औरतें
भाषा के भदेश को मिटाती हैं औरतें
जनसैलाब की अगली कतर में हैं औरतें
इंक़िलाब की गुहार लगाती हैं औरतें
हसीन दुनिया के सपने सजोती है औरतें
मानवता  की मुक्ति चाहती हैं औरतें

जी हाँ कविता भी लिकने लगी हैं औरतें
अपनी अलग पह्चान बनाने लगी हैं औरतें
कलम को हथियार बनाने लगी हैं औरतें
कलम ही नहीं बंदूक भी उठाने लगी हैं औरतें
भेदभाव-उन्मूलन  करेंगी औरतें
अब ज़माना बदलने निकाल पड़ी हैं औरतें
[2011]



बीता वक़्त


बीता वक़्त आता नहीं लौटकर
खींच जाता है मन पर
सुख और अवसाद की टेढी-मेढ़ी रेखाए
सजा हो जिसे याद करना
वह याद कुछ ज्यादा ही आता है
कभी कभी सज़ा में भी कुछ मज़ा आता है
[ईमि/२३.०७.२०१३]

Saturday, July 20, 2013

सलामती-ए-ज़मीर


सलामती-ए-ज़मीर
मंजिलें और भी हैं मंजिल-ए-खुदी के सिवा
सलामती-ए-ज़मीर खुद एक मुकम्मल मंजिल है
दिल की तसल्ली ही नहीं
उसूलों का उद्गम भी है ज़मीर की सलामती
लगा देती है प्रवेश-निषेध की तख्ती अवांछनीय रास्तों पर
ज़िंदगी का होता नहीं कोइ जीवनेतर मकसद
ज़िंदगी-ए-ज़मीर खुद-ब-खुद एक मकसद है
तय होती हैं मंजिलें सफ़र के अनचाहे परिणामों की तरह
हर पड़ाव है एक मंजिल ऐसे सफ़र की
कोई अंतिम मंजिल नहीं होती मौत के सिवा.
[ईमि/२१.०७.२०१३]

जो जीते हैं ज़मीर बेचकर

रहते हैं वहम-ओ-गुमान में
सलामत है ज़मीर जिनकी
बनाते हैं कारवानेजूनून.
[ईमि/२१.०७.२०१३]










Thursday, July 18, 2013

रक्तपात

रक्तपात
ईश मिश्र
जी हाँ सदियों से होते रहे हैं रक्त-पिपासु इंसान
काटे जसने जितने सर बन गया वह उतना ही महान
तलवार के नोक पर बनते-बिगड़ते साम्राज्य थे
कातिलों के गिरोह के मुखिया बन जाते महाराज थे
तोड़ते थे सांस्कृतिक प्रतीक बाहुबल के अहंकार में
कट जाते थे हाथ उठते जो प्रतिकार में
इतिहास भरा पडा है इन महानों की वीरगाथाओं से
मानवता के रुदन की मार्मिक कथाओं से
लम्बी कतार है महान सिकंदरों, अशोकों, अकबरों की
कोलम्बसों, नैपोलियनों, मुसोलिनी-हिटलरों की
 पंजाबों, कलिंगों और मेवाडों के ज़ख्मों की
इंका और अज्टेक के खंडहरों में गूंजती आहों की
जी हाँ, हजार साल पहले आया था एक लुटेरा महमूद
सोने-चांदी की लालच में किया था सोमनाथ को नेश्तनाबूद
बचा नहीं सके उसे चंद लुटेरों से उसके असंख्य भक्त
भगवान् तो होता ही भक्तों को बचाने में अशक्त
कहाँ खो गए थे हमारे सारे शूर-वीर
लूट रहा था महमूद जब सोमनाथ की जागीर
लूट कर ले गया वह संपत्ति अपार
भगवान क्यों करता है इतनी धन-दौलत का कारोबार
नहीं था महमूद पहला या अंतिम लुटेरा
बनाते रहे हैं लुटेरे इस मुल्क को बसेरा
कुछ घुड़सवारों के साथ आता है एक चरवाहा, नादिर शाह
रौंदकर पेशावर से बंगाल तक कर देता है तबाह
होती है ऐसे समाजों की यही नियति
बहुजन हों जहाँ शस्त्र-शास्त्र से वंचित
आये यहाँ मुट्ठी भर अंग्रेज करने को व्यापार
लूटते रहे मुल्क को पूरे दो सौ साल
सीख ली मोदी ने मुसोलिनी-हिटलरों से
चंगेजों, महमूदों, नादिरशाहं से
मार दिए उसने काफी मुसलमान
बन गया वह कार्पोरेटी दुनिया में महान
होता है जहां भी मासूमों का रक्तपात
बढ़ जाता है पीड़ा से आवाम का रक्तचाप
बंद होना चाहिए क्रूर कातिलों का गुणगान
चैन से रह पायेगा तभी इन्सान
अतीत के पुनर्जन्म की कोइ भी खुराफात
साजिश है गहरी भविष्य के खिलाफ
[ईमि/१९.०७.२०१३]

लल्ला पुराण १०१

धीरेन्द्र जी मैंने बहुतों से बहुत कुछ सीखा है अपने छात्रों और बे५तियोन से सीखता रहता हूँ.. Words acquire meaning through tone and connotation. आपका गुरू चेला का tone and connotation भक्ति-  भाव से अनुशरण वाले गुरू चेले का है. आपकी याददाश्त साथ नहीं दे रही है.  आपके प्रोफाइल के अनुसार आ १९७४ में इलाहबाद आये. मैं १९७२ में .आया था. जिन राकेश श्रीवास्तव की आप बात कर रहे हैं और जिन्होंने खुद (आपके बताने से शायद) वे मेरे गुरू नहीं  सीनियर मित्र थे. क्रिसन प्रताप (स्वर्गीय); रमाशंकर प्रसाद; शीश खान; रामजी राय; देवी प्रसाद त्रिपाठी (तबके वियोगी), राकेश भी "परिवेश" पत्रिका से जुड़े थे, मैं भी नए नए मार्क्सवादी के रूप में इनका सहयोगी था. इन सबके सत्संग में बिना गुरू-चेले के  झमेले के बहुत कुछ सीखा.कुछ औपचारिक शिक्षकों की भी इज्ज़त करता हूँ. राकेश श्रीवास्तव को आचरण में विरोधाभाषों के चलते लोग श्री राकेश कहते थे. उनके शिक्षक होने और शादी के३ बाद हमारी मुलाक़ात इलाहाबाद में कभी नहीं हुई न ही मैं कभी उनके घर गया. शादी के बाद हमारी उनसे मुलाक़ात दिल्ली में हुई जब वे सपत्नीक युपीएससी  में साक्षात्कार देने आये. अपने श्री राकेश के घर किसी और को भक्ति-भाव से प्रवचन सुनते देखा होगा. मैं इलाहाबाद पहुँचने तक प्रामाणिक नास्तिक हो चुका था इसलिए भक्ति-भाव का सवाल ही नहीं होता. श्री राकेश को जब विश्वविद्यालय में नौकरी मिली तो मं आपातकाल में नैनी में था और दीआईआर से छूटने के बाद मीसा के वारंट से बचने के लिए दिल्ली आ गया था भूमिगत रहने. सुखद संयोग से डीपी त्रिपाठी को ख्जते वजे.एन.यु. पहुँच गया था. मैं तो तब भी जूनियर सीनियर में यकीन नहीं करता था आप को देखा होगा कभी मिले नहीं इसलिए मुझे आपकी तस्वीर बिलकुल अपरिचित लगती  है. जी हाँ आपने ही बतया की आपकी श्री राकेश  से बात होती रहती है और आपने फोन नंबर दिया था और हमारी एक बार बात भी हुई थी. जो लोग ७० के दशक में फैशन या मौकापरस्ती में मार्क्सवादी बने थे वे भूतपूर्व हो गए सम्प्रति निष्ठा वाले बचे हैं.   कीजिये श्री राकेश के घर आपने किसे देखा था? मैं तो इलाहाबाद में कभी उनके घर गया नहीं. नहीं तो श्री राकेश से फोन कर पूछ लीजिये. आमीन.

Wednesday, July 17, 2013

लल्ला पुराण १००

शशांक, इस लडकी की बातों का बुरा  मत मानना, यह टेढ़ी-मेढ़ी सई के किनारे की टेढ़े-मेढ़े दिमाग वाली पागल लडकी है, दिल आ गया तो उम्दा बोल देगी नहीं तो बखिया बिखेर देगी. यहाँ इसके और राज़ खोलकर अपनी सामत नहीं बुलाऊंगा. इस कविता में कवि वियोग में लिखी प्रेम-कविता को राजनैतिक रंग देने की साज़िश रचता है, जिसके लिए राष्ट्र-हित में उसका एन्काउन्टर भी हो सकता है. गुजरात को मोदी का बताकर "विकास पुरुष" पर छींटाकशी का भी मामला बनता है. एक प्रेमिका अपने पुराने प्रेमी से कहती है कि उसके दिए सारे ज़ख्मों को वह भूल जाए और नए हालात में नए सिरे से रिश्ते शुरू करे . प्रेमी को आभासी और वास्तविक दुनिया में मोदी भक्तों की २००२ को भूलने की नसीहतें याद आ जाती हैं और वह तुलना करने की गुस्ताखी कर बैठता है. आमीन.

लल्ला पुराण ९९

नहीं मित्र, हम-आप जैसे लोग न तो मौकापरस्त हैं न  निकम्मे.  पूंजीवाद में एलीनेटेड श्रम की अभिशप्तता  तथा इतिहास की तेज रफ़्तार और शासक-वर्गों की वैचारिक पैंतरेबाजी के सही आंकलन की कमी एवं विक्सित पूंजीवादी देशों में वर्ग-चेतना की दयनीय दशा के जतल मकडजाल के चलते हम अभी किंकर्तव्यविमूढ़ हैं, मैं तो अनंत आशावादी हूँ और पोरी उम्मीद है की स्थितियां तेजी से बदलेंगी और यह मकडजाल भस्म हो जाएगा. जनवाद के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है, विशाल मध्यवर्ग. पूंजीवाद एक दोगली व्यवस्था है यह जो कहता है कभी नहें करता और जो करता है कभी नहीं कहता. यह चतुराई से अपनी कुछ privileges जो पहले सिर्फ शासकवर्गों को उपलब्ध थी उनमें से कुछ सुविधाएं यह मध्य वर्ग के साथ शेयर करता है और शिक्षित नटों-भांटों की एक बड़ी जमात खड़ा करता है जो जनवादी चेतना के प्रसार में सबसे बड़ा बाधक है. 

Tuesday, July 16, 2013

मोदी के गुजरात की तरह


तुम कहते हो भला है इसी में सबका
हमारा, तुम्हारा और रकीब का
इतना नहीं देश और समाज का भी
इसी में भला है
कि भूल जाओ जो भी हुआ जैसा भी हुआ,  
अपना लो अब जो भी है जैसा भी है   
शुरू करो नए सिरे से नए प्रकरण
खुद टूटोगे तोड़ोगे गर
नई वस्तुस्थिति की सीमाएं
मोदी के गुजरात की तरह  
आगे बढ़ो, प्रगति करो
मोदी के गुजरातकी तरह
मत पूछो अपने आपसे भी
अब तक के अनुत्तरित सवाल
मत फैलाओ तर्क-विमर्श का मायाजाल
ढक लो रिसते हुए सारे घाव
जम जाने दो बनकर नासूर उन्हें 
आदत पड जायगी  दर्द  सहने की
ठीक सा लगेगा सब कुछ वक़्त के थपेड़ों से
मत पढो इतिहास और सिमट जाओ भूगोल में
चलते जाओ नामुराद लाशों पर  
छोड़ दो यादें माजी की
ज़िंदा रहो लाश बनकर और आगे बढ़ो
मोदी के गुजरात की तरह.
[ईमि/१७.०७.२०१३]

Monday, July 15, 2013

लल्ला पुराण ९८

इस पोस्ट में निजी और सामाजिक आज़ादी के अंतरसम्बंदों पर इलाहाबाद के एक फेसबुक ग्रुप में मेरी एक कविता पर कमेंट्स पर मेरे कमेन्ट हैं.

अग्रज प्रणाम. पूंजीवाद यानि कि आधुनिकता एक दोगली व्यवस्था है. कथनी करनी के अपने  अन्तर्निहित अंतर्विरोध को छिपाने के लिए यह खुशफहमियां बेचता है. सामूहिकता से अलग निजी आजादी वैसी ही एक खुशफहमी है. व्यक्ति का अस्तित्व एक व्यक्ति के र्पूप में नहीं होता किन्तु एक सामूहिकता के हिस्से के रूप में होता है जिसमे वह एनी व्यक्तियों के साथ अपनी इच्छा के स्वतंत्र एक सामाजिक रिश्ते में जुदा होता है. क या ख गुलाम या मालिक एक व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कियो समाज के अभिन्न हिस्से के रूप में एक स्तापित सामाजिक संबंधों के तहत ऐसे होते है. स्वेच्छा से कोइ भी गुलाम या बीबी नहीं बनाना चाहेगा.



This is a comment on a comment on a  poem of mine on individual v/s collective freedom. Please comment.

 The existing liberal "freedom", which we also call the bourgeois freedom, is freedom not in association with others but in separation from others. The institution of private property creates inequalities that leads to relative freedom and unfreedom. One is sole owner of  of ones' possessions and can dispose of as he/she wills without consideration to others. A is not slave and master as natural individual but in and through a society under certain social relations which he/she has entered in the process of historical development independent of his/her conscious will. One sees not realization of his/her freedom in others' freedom but its limitation.

I'll explain it with an example: A, B and C are 3 individuals. A is, let us say, a university professor like me or Dhirendra bhai. He/she has modestly very good income from public money. He has quite congenial atmosphere around him a 'happy' family; has reasonably good friends and followers, people take him seriously on fb.  Though would not mind a palatial accumulation on Pandit Pant Marg and also won't mind owning a helicopter but is happy in his British period modest bunglow in the University and a Hundayi i10. Would not mind having his own holiday home in Mussoorie but is quite happy to find a place to holiday in LBS Academy or Advanced Srtudies (Shimla). He is free to write or not to; to speak or not to on any6thing; on capitalism/Communalism/communism/gender... .  as long as it does not become dangerous for the system. If you ask A, is he free? Instant answer is, "of course. Is there any doubt?"

 B, is let us say is a CHHOTU or BAHADUR working on a grocery shop or a Dhaba. His morning begins at 5-6 AM and day ends at 9-10 PM. He has a shelter in the shop to spend the night and something to eat. His knowledge is his acquired moralities like sex unpalliated marriage is sin; obedience to master and eldersd is virtue. His only source of entertainment and education is TV in the shop. He has no time to think aboput freedom or unfreedom. His only worry is  that the Master might get angree on his some word/act and kick him out and he would be on roads again.

C is an honest, educated, unemployed man/woman with a PhD degree in his/her 30s. He/she is free to do anything. He can write/speak on communism/capital;ism/disasters in Uttarakhand/deteriorating academic level in AU and so on... But we al know he/she does not do any of these things. He feels angry with family who think he is good for nothing. He feels bitter against better off friends. ....   And one evening he hangs himself from the ceiling fan for which he is absolutely free.

If you ask A that if he is free then are B&C also free? His answer would be no. Then are unfreedoms of B&C unrelated to the freedom of A? How can they be made free? By raising them to the level of A and that needs nothing less than a revolution which we seek. If B&C are unfree, is the society free? Can an individual be free in an unfree society? My answer is no. To be free, society has to be freed. Freedom in an unfree society is an illusion.

मैं अपनी बात आपी आख़िरी बात से शुरू करता हूँ. कविता में समाज का अंतर्विरोध झलकता है और जैसा मैं पहले कह चुका हूँ कि इतिहास की गति अंतर्विरोधों यानि विलोमों की द्वद्वात्मक संश्लेषण से निर्धारित होती है. आपने बिलकुल सही कहा, मेरी कवितायें नारा ही होती हैं जिसकी स्वीकारोक्ति मैं एकाधिक कविताओं में कर चुका हूँ. (RADICAL, ishmishra.blogspot.com). मार्क्स ने एक ख़ास सन्दर्भ में, मजाक में कहा था कि वे मार्क्सवादी नहीं थे. मार्क्सवाद कोइ जड़ वास्तु या आस्था नहीं है, मार्क्स के बाद मार्क्सवाद काफी दूरी तय कर चुका है. यह कोइ बंद दडबा नहीं है बल्कि चारों तरफ से खुला हुआ एक मडहा है.

आपके दुर्लभ विचारों के लिए साधुवाद. आप ठीक कह रहे हैं कि समाज विभिन्न व्यक्तियों से हे नहीं विभिन्न किस्म के व्यक्तियों से  बना है. भिन्नता को असमानता के रूप में परिभाषित करने का काम शासक वर्गों के रखैल९जैविक बुद्धिजीवी करते रहे हैं. पहले भिन्नता को असमानता केरूप मन परिभाषित करते हैं और फिर उसी परिभाषा से असमानता सिद्ध करते हैं. अरस्तू के अनुसार, गुलाम  होते हैं जिनमें बुद्धि की कमी होती है, इसका पता कैसे चलता  है, वे गुलाम हैं इसी से. व्यक्ति का सर्वांगीण विकास एक वर्ग-विहीन शोषणमुक्त समाज में ही हो सकता है क्योंकि तब व्यक्ति का अपनी रचनाशीलता और श्रम-शक्ति पर अपना अधिकार होगा. जब तक कोइ बात घटित नहीं होती तब तक वह एक काल्पनिक आदर्श लगती है.हमारे छात्र-जीवन से अब तक दलित-प्रज्ञा और दावेदारी तथा नारी-प्रज्ञा और दावेदारी लम्बी छलांग लेकर जातिवाद और मर्दवाद के दुर्गद्वारों पर बुलंद दस्तकें तब एक काल्पनिक आदर्श लगता था. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का नियम है, निरंतर, क्रमिक मात्रात्मक परिवर्तन क्रांतिकारी गुणात्मक परिवर्तनों में परिपक्व होते हैं. एक क्रांतिकारी असंभव पर निशाना साधता है और सैद्धांतिक रूप से उसकी संभाव्यता प्रमाणित करता है जिसकी कार्यरूप में परिण प्रमाणित करता है औसके ति महज वक़्त का मामला है.

Shailendra Singh मैंने captive intellectual का हिन्दी अनुवाद कर दिया है. टाइपिंग की गलती से "जैविक" के इर्द-गिर्द कोष्ठक छूट गया और 9 छप गया. किसी ख़ास वर्ग के हितों के हिमायती चितकों के लिए ग्राम्सी ने जैविक (organic) बुद्धिजीवी का सिद्धांत प्रतिपादित किया है (Antonio Gramsci, Selections from Prison notes). उपरोक्त कमेन्ट में रखैल बुद्धिजीवी शब्द का इस्तेमाल मानव-निर्मित असमनाताओं को स्वाभाविक बताने वाले दार्शनिकों और ख़ासकर, अरस्तू के प्राचीन ग्रीस की दासता की हिमायत में सन्दर्भ में कही गयी है. "Who is a slave?","one who is rationally deficient". "what determines rational deficiency? "the fact that one is slave". the circular logic. अब अरस्तू या हेगेल की आलोचना से किसी की भावनाएं आहत हों और वह बौखला जाये तो मैं क्या कर सकता हूँ? अशालीन भाषा क्या होती है? अरस्तू को तत्कालीन शासकवर्गों (गुलामों के मालिकों) का captive intellectual कहना ज्यादा अश्लील है या किसी निष्ठावान व्यक्ति को पता नहीं किसका चेला बताना या बिना तर्क के लकीर का फकीर बताना? कुछ लोगों को मार्क्सवाद को गालियाँ देने का लाइलाज रोग है. वे यदि थोड़ा-बहुत मार्क्सवाद पढ़ भी लेते तो उनकी गालियों का गुरुत्व कुछ बढ़ जाता.

Saturday, July 13, 2013

अकेले नहीं लड़ी जाती कोई जंग

अकेले नहीं लडी जाती कोई जंग
अकेले ज़िंदगी काटी जाती है
एक गुलाम समाज में
निजी आज़ादी का एहसास
सब्जबाग की एक मरीचिका है
गर होना है सचमुच  आज़ाद
मुक्त करना पडेगा समाज को
छेड़ने पड़ेंगे तराने जंग-ए-आज़ादी के
तैयार करना पडेगा एक कारवाने जूनून
मेहनतकश के जनसैलाब का
बीत चूका है दुर्गद्वार पर
दस्तक देने का वक़्त
नहीं होता बीच कोई रास्ता
तोड़ना ही है वर्चस्व का दुर्ग
बसाने के लिए एक सुन्दर मुक्ति-द्वीप
[ईमि/१४.०७.२०१३]

Wednesday, July 10, 2013

महामहिम


पूरे इलाके में की दिनों से यही चर्चा थी
चौराहों  की अड्डेबाजी का यही विषय था
कि महामहिम मेरे गाँव आने वाले हैं
शिलान्यास करने एक अनाथालय का
दंगों में अनाथ हुए गाँव के तमाम बच्चों के लिए
कोइ फुसफुसाया दंगों में तो महामहिम का ही था
किसी ने ललकार कर दिया सवाल उससे
महामहिम के क़त्ल की साज़िश रच रहा हो वह जैसे
करवाया होता  दंगे अगर महामहिम ने
 क्यों लेने आतेपीड़ितों की सुध?
वैसे महामहिम को आता है
पागलों का मुह भी करना बंद

उस दिन जब महामहिम मेरे गाँव आये
थर्रा गया था गाँव  देख आगे पीछे की वर्दियां
देख महामहिम के इर्द-गिर्द सुरक्षा घेरे
याद आने  लगा कौटिल्य का अर्थशास्त्र
होती है महामहिमो की सुरक्षा की  जरूरत
अर्थशास्त्र के विजिगिशु की तरह
जो सत्तासीन होता था तलवार के बल से
आज के माहामहिम
करते है हासिल कुर्सी संख्या बल से
बने रहेंगे महामहिम के सुरक्षा घेरे
संख्याबल के जनबल में  कायाकल्प तक
वैसे महामहिम को कहीं जाने की जरूरत ही क्या?
उस दिन महामहिम जब मेरे गाँव आये
घेर लिया था पूरा गाँव  वर्दियों ने
औरतें दिशा मैदान नहीं जा सकीं  
न जा सके बच्चे स्कूल
महामहिम के चारों और हीवर्दियां  वर्दियां
महामहिम के मंच पर आने के पहले
गाँव के कुछ उप-महामहिमों ने कशीदे पढ़े
महामहिम-चालीसा से उकेर कर
महा महामहिम की लोकप्रियता
और आमजन की खुदाई के
पेश किये मनमोहक आंकड़े जो
जी हाँ मेरे गाँव में भी कुछ नायब महा महिम हैं
लोहे के डंडों से और वर्दियों घिरे महामहिम
एहसान जता रहे थे वर्दियों से घिरे कि गाँव वालों का
उनके असीम प्यार के लिये
और बता रहे थे
कितना जरूरी है दूरी महामहिम और गाँव के बीच
प्यार को बनाए रखने के लिए
तभी चिल्लाया दूर से सुआरथ का नंग-धिडंग बेटा
राजा नंगा है-राजा नंगा है
धुंवा निकला कुछ वर्दियों की बंदूकों से
क्या अचूक निशाना होता है
देश के इन रक्षकों का
ढेर हो गया वह बालक
अफरातफरी के बीच महामहिम ने
कहा कितना बहादुर था वह लड़का
शहीद हो गया देश की खातिर
महामहिम फिर कभी नहीं आये मेरे गाँव
लेकिन इतना प्यार है महामहिम को गाँव से
कि देश के लिए शहीद बालक के नाम से
रख दिया अनाथालय का नाम
सुआरथ के शहीद बेटे के नाम पर
फिर  आने वाले थे महामहिम मेरे गाँव
देश के लिए उसी तरह शहीद होने वाले बच्चों की तलाश में
बाद में हटा लिया गया उस बच्चे का नाम
अनाथालय के द्वार से
क्योंकि मालुम हो गया तब तक महा महिम को
कि वह बच्चा देश-भक्त नहीं, नक्साली था
जो ख़ाक में मिलते हैं, शहीद नहीं होते
देश की सुरक्षा के मद्देनज़र
महामहिम फिर नहीं आये मेरे गाँव[ईमि/१०.०७.२०१३]

लल्ला पुराण ९७


बुद्ध न राजा थे न राजकुमार. मैंने एक बार उत्तर वैदिक गणतंत्र पर एक प्पोस्त डाला था ईद मच पर, बहुत पहले. गंगा के दक्षिण मगध और काशी जैसे राजतंत्र थे और उत्तर संघीय व्यवस्थाएं थीं, जिन्हें प्राचीन भारत के इतिहासकार "उत्तर-वैदिक" गणतंत्र कहते हैं. मगध एवं एनी आक्रमणकारियों के विरुद्ध शाक्य जनजातीय गणतंत्र १२ गणतंत्रों ने वैशाली के नेतृत्व में महासंघ बना रखा था जिन्होंने बिम्बसार और अजात शत्रु के शासन काल में मगध के आक्रमणों को निरस्त करते हुए उसे पराजित करके  वापस चले जाते थे. उनकी ब्नाव्सेना काफी सशक्त और कुशल थी. इन गणतंत्रों में स्थायी सेना नहीं होती थी किन्तु सभी नागरिक -- स्त्री-पुरुष -- सैन्य-कार्य मेर प्रशिक्षित होते थे और युद्ध के समय हल-कलम-शिल्प छोड़ सैनिक बन जाते थे. राहुल सांस्कृत्यायन के अनुसार, स्त्रियां अक्सर चिकित्सा यूनिट में होती थीं लकिन कई स्त्रिया नवसेना और घुडसवार सेना में भी तीर-तलवार की निपुणता दिखाती थीं.

बुद्ध के पिता शाक्य-गणतंत्र के मुखिया थे. पड़ोसी राज्य के साथ बड़ी के पानी के बंटवारे को लेकर युद्ध की नौबत आयी और बुद्ध ने युद्ध का विरोध किया जो कि राजनैतिक अपराध मना जाता था. प्राचीन यूनान की तरह वहाँ भी नियम था निर्वासन या मुक़दमा.बुद्ध ने निर्वासन चुना और गौतम से बुद्ध  होने के बाद ही दुबारा कुशीनगर गए. सुकरात ने एथेंस में मुक़दमे का सामना पसंद किया और मृत्यदंड पाया. अरस्तू ने निर्वासन चुना था और चेल्सिया नमक राज्य में २ साल बाद मर गए मौत के बाद अपने असंख्य गुलामों को मुक्ति देकर. मनु का काल बुद्ध के काल से कम-से-कम ६-७०० साल बाद आता है, जब ब्राह्मणवाद(वर्णाश्रम) बौद्ध प्रभाव से चरमरा रहा था. मनुस्मृति में बहुत सा अंश सीधे महाभारत से लिया गया है (इसका उलटा इसलिए नहीं है क्योंकि महाभारत मनुस्मृति से पुराना माना जाता है). बुद्ध के पोराभ्हाव से लड़ पाने में अक्षम ब्राह्मणवाद ने उभे अवतार बना दिया.

Monday, July 8, 2013

चलो ! मिलते हैं


चलो ! मिलते हैं फिर एक बार
ऐसे जैसे मिल रहे हों पहली बार 
यहाँ नहीं. कहीं और
जहां तुम मुझे सुन सको
और मैं पहचान सकूं तुम्हारी आवाज़
आओ चलें किसी अनजाने द्वीप पर
यहाँ न तुम सुन पाती मुझे
और मुझे सुनाई देती है
तुम्हारी बातों में अनकही बातें  
 प्रतिध्वनियों से दम घुटता है
आओ मिलते हैं फिर से
ऐसे जैसे पहले मिले ही नहीं
लेकिन कहीं और 
और अजनबी बनकर
आपरिचित चेहरों के साथ
खोजें एक दूजे को
आँख बंद कर टटोलते हुए
पुकारें अनकहे अनसुने शब्दों में
शुरू करें नया संवाद
समझ सकें हम जिससे
पारस्परिक अस्मिताएं
उनकी सम्पूर्णता में
अंशों में नहीं  
आओ मिलते है
लेकिन कहीं और यहाँ नहीं
क्योंकि मिलने की जरूरत है
संभव है मिलने से 
उन बातों पर हो सके बात
जिन्हें नहीं होना चाहिए था
और एक नई धूप की रोशनी में
हो सकता है हम झाँक सकें
एक दूसरे की दुनिया में
मुक्त कर सकें जहां 
अपने अंश नहीं सम्पूर्ण अस्तित्व
और सत्यापित कर सकें
साश्वत परिवर्तनशीलता का सिद्धांत
 आओ मिलते हैं
 यहाँ नहीं, कहीं और
किसी नए द्वीप में जहां न हों दीवारें 
और न सुनाई दे प्रतिध्वनियां
संवाद के गढे जा सकें नए स्वर
अनकहे अनसुने
अनक्षर अनश्वर
आओ मिलते हैं लेकिन कहीं और.
यहाँ नहीं.
[ईमि/०७.०७.२००७]


Sunday, July 7, 2013

लल्ला पुराण ९६

RSS is a fascist organization, its longest time chief Golvalkar had  eulogized Hitler for the race spirit and cleansing of sametic races and had  implored  Hindus to immitate Hitler. Shiksha Saxena on the basis of views(or lack of it) of some individuals, you cant generalize about level of AU, like else where it has all kinds of people, it has produced many revolutionaries. There are such reactionaries even from JNU. kabul men gadhe bhi hote hain. I agree with you that a large section of middle class everywhere is supporter of fascist murderers and rapists like Modis, Togadiyas, Babu bajrangis and Advanis. Our education does not impart knowledge but equips students with information and skills to maintain the status quo. If you want to acquire knowledge you have to make separate efforts.

Saturday, July 6, 2013

सोचो माजी का और सीख लो उससे

सोचो माजी का और सीख लो उससे
आज को आच्छा बनाओ
कल देखेंगे क्या होगा.

गलतियां प्यारी कितनी भी हों
गर होता है पछतावा दिल से
बच जायेंगे दुहराने से उनको
करेंगे नई गलतियां और सीखेंगे उनसे.
[ईमि/०७.०७.२०१३]

Friday, July 5, 2013

तस्वीर


कविता लिखने को जी चाहता है इस तस्वीर पर
तकलीफ के उमड़ते सागर सी आँखे
और चहरे पर असंभव को साधने का संकल्प
तलाश रही हो जैसे जीने का नया विकल्प.
[ईमि/०५.०७.२०१३]

निराई के बहाने

मुजरिमों क लिए पहले डूब मरने की कहावत थी
कहते हैं आमजन की उनसे अदावत थी
डूबते-मरते नहीं मुजरिम आजकल
काट लेते हैं निराई के बहाने फसल
कहते हैं होती है क्यों इससे हैरान अकल
वे तो कर रहे हैं महज हुक्मरानों की नक़ल
[ईमि/०५.०७.२०१३]

Thursday, July 4, 2013

शब्द -शूल

टपक जाते है गर गलत शब्द कभी भूल से 
चुभते हैं वो दिल में दर्दनाक शूल से
[ईमि/०५.०७.२०१३]

Wednesday, July 3, 2013

खुशफहमी-ए-मुहब्बत



 खुशफहमी-ए-मुहब्बत में ज़िंदगी बिता दी
मारे गए आखिर बेवफा दोस्ती की घात से
उठे हैं कब्र से अबकी जो हम
चौंका देंगे दुनिया को अनूठे करामात से
उतार फेंका है सर से बोझ माजी का
बढ़ेंगे आगे अब बुलंद जूनून-ए-जज्बात से.
[ईमि/०४.०७.२०१३]

Monday, July 1, 2013

लल्ला पुराण ९५

पूंजीवादी चीन या  विघटित सोवियत संघ मार्क्सवाद नहीं हैं. मार्क्सवाद समाज और इतिहास की गति और उसके नियमों को समझने का तथ्यों-तर्कों पर आधारित विज्ञान है जो सत्यापित को ही सत्य मानता है. रूसी-चीनी क्रांतियाँ नन्वादी अभियान के पड़ाव थे, मंजिल नहीं. वैसे यहाँ बहस का मुद्दा यहाँ मार्क्सवाद नहीं बल्कि वाल्मीकि रामायण है. यह मार्क्सवाद का आतंक है कि बहस का मुद्दा कुछ भे हो लोगों के सर पर मार्क्सवाद का भूत सवार हो जता है. मार्क्सवाद पर हम अलग से बहस कर सकते हैं. वैसे तमाम लोग मार्क्सवाद का म पढ़े बिना फत्वानुमा वक्तव्य देते रहते हैं. १७-१८ साल की उम्र में जब मैं और रामाधीन भाई साथ साथ संघी छात्र राजनीति करते थे तो मैं भी अपने पूर्वाग्रहों  आधार पर मार्क्सवाद को खूब गालियाँ देता था. विद्यार्थी परिषद् के कार्यालय के नीचे पीपीएच की दूकान थी वहां उठते-बैठते-पढते दुनिया की समझ का फलक विस्तृत होने लगा. रामाधीन भाई साहब बाकी संघियों की तरह प्रेक्टिकल राजनीति में इतने व्यस्त रहे कि समझ बदलने का मौका ही नहीं मिला होगा.

लल्ला पुराण ९४

किसने कहा मार्क्सवाद सिमटता गया, मार्क्सवाद का भूत लोगों के सर पर ऐसा सवार है कि कोइ भी तर्कसंगत बात करो तो लोगों के सर पर मार्क्सवाद और माओवाद का भूत सवार हो जाता है. किसने कहा काल्पनिक नायक ईश्वरत्व की और बढ़ता गया? वाल्मीकि ने तो ऐसा नहीं  कहा. दर-असल हमारी धर्मान्धता और धार्मिक श्रद्धा ऐसी है की कोइ भी भगवान/भगवती बन सकता है. १९८० के आस-पास एक फिल्म आयी सन्तोशी माता, खूब चली और संतोषी माता नाम की एक नई लोकप्रिय देवी अवतरित हो गयी. फिल-निर्माता चालू था , बाकी दिन तो कई देवताओं में बंट चुके है तो इस नई देवी के लिए शुक्रवार निश्चित किया. हमारी एक सहकर्मी हाँ संतोषी माता का बरत रखती हैं और नारीवाद  पढ़ाती हैं. मैंने कहाँ कहा बौद्ध साहित्य पाली में संस्कृत के विरोध में लिखा गया? बिलकुल सही कह रहे हैं प्रचार की व्यापकता के लिए पाली में लिखा गया और कई लेखकों को संस्कृत आती भी नहीं थी.

लल्ला पुराण ९३

वाल्मीकि रामयाण बुद्ध के बहुत बाद लिखी गयी है, कौटिल्य के 

अर्थशास्त्र के भी बहुत बाद. कविता और उपन्यास में

कवि/लेखक की कल्पना द्वारा हकीकत का अमूर्तीकर्ण किया जाता है. 

कभी कभी हम उसके पात्रों को ऐतिहासिक/दैविक


मान लेते हैं. पुष्यमित्र द्वारा बौद्ध जन-संहार के बाद हूण-कुषाण काल में

बौद्ध दर्शन के पुनर्प्रसार से

संकट में पड़े वर्णाश्रमवाद यानि ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना का यह एक

प्रभावी प्रयास था.


प्रणाम अग्रज! भाषावैज्ञानिक शब्दों के वश्लेषण की आधार रामायण का रचना काल महाभारत के बाद और मनुस्मृति के बाद का मानते हैं. कौटिल्य अर्थशास्त्र में लगभग हर पूर्ववर्ती विद्वानों और गुरुओं एवं परम्पराओं के विचारों को उद्धृत करने के बाद ही अपने विचार प्रदिपादित करते हैं. वाल्मीकि के विचार या राम नाम के किसी चरिते का वर्णन नहीं करते. कृष्ण की चर्चा जरूर है. विजिगिशु को राय देते हैं की विजय अभियान पर निकलने के पहले उसे देवताओं और दानवों का स्मरण कर लेना चाहिए और कृष्ण को कंस के साथ दानवों की श्रेणी में रखते हैं. उन्ही का समकालीन मेघस्तानीज  कृष्ण की चर्चा सूरसेन क्षेत्र (मथुरा) के एक स्थानीय लीजेंडरी नायक के रूप में करता है. यानि कि कौटिल्य के काल तक कृष्ण एक आर्य नायक नायक भी नहीं थे.