Saturday, November 18, 2017

बेतरतीब 22 (बचपन 1)

बचपन की यादों के झरोखे से (भाग 1)
ईश मिश्र
मेरे गांव के बचपन के एक मित्र का बेटा जो मुझे भी प्रिय है, यद्यपि दुआ-सलाम के अलावा बात-चीत कम ही हुई है, लेकिन सही एक्सपोजर मिलने पर संभावनाएं हैं। पिछली बार गांव की यात्रा में किसी मित्र ने कहा कि आप अपनी बिरादरी की अवहेलना मत किया कीजिए, मैंने मान लिया। मैं व्यक्तियों या जतियों की नहीं, प्रवृत्तियों की समीक्षा करता हूं, जाति कभी उसमें संयोगात आ जाती है। मेरी इलाबाद विवि में प्रोफेसरों की जातिगत लामबंदी पर एक पोस्ट पर इस प्रिय भतीजे (गांव के रिश्ते से पोता लगता है) ने याद दिलाया कि मैंने गांव में किसी से जाति पर न बोलने का वायदा किया था और यह कि विवि में, वह भी दिल्ली विवि में, प्रोफेसर होने के बावजूद गांव का कोई भी मुझ पर गर्व नहीं करता। मैं सेंटिया के नस्टल्जिया गया और जवाब लंबा आत्मकथात्मक लेख बन गया, जिसे कमेंट बॉक्स ने अस्वीकार कर दिया। 

इसमें किसी जाति-विरादरी की अवहेलना कहां है? इसमें तो एक घटना का जिक्र है और अफशोस जाहिर किया गया है कि सर्वोच्च शिक्षा के बावजूद लोग जन्म की संयोगात्मक अस्मिता से ऊपर उठ नहीं पाते। मैं इसलिए कोई काम नहीं करता कि मुझ पर कोई गर्व या शर्म महसूस करे, बल्कि इसलिए कि वह करना-कहना मेरे लिए विवेक सम्मत और मानवता के हित में है। मैंने अपने गांव के लिए कुछ किया ही नहीं तो कोई गर्व-शर्म क्यों महसूस करे? मेरे बारे में कौन क्या सोचता है वह उसकी सोचने की आजादी है। किसी की सोच उसकी फेसरी तो जीविकोपार्जन की नौकरी है जो किसी विरले संयोग से मिल गई, नहीं तो किसी और श्रम-बाजार में श्रमशक्ति बेचता। पूंजीवाद में आजीविका के लिए हम सब श्रम-शक्ति बेचने को अभिशप्त हैं, क्योंकि पूंजीवाद ने श्रमिक को श्रम के साधन से मुक्त कर दिया है और दुनिया को लेबर चौराहों का उपहार दिया है। शासक वर्ग जानबूझकर, जाति-धर्म जौसे कृतिम या गौड़ अंतर्विरोधों में श्रमिक और श्रमशक्ति की आरक्षित फौज (बेरोजगार) को फंसाकर मुख्य अंतर्विरोध, रोजी-रोटी यानि आर्थिक अंतर्विरोध की धार कुंद करने की कोशिस करता है। जब भी गांव जाता हूं, तो अपनी शक्ति की सीमाओं पर अफशोस होता है कि काश मैं यहां एक पुस्तकालय वाचनालय स्थापित कर सका होता! इतनी प्रचुर प्रतिभा देखता हूं लेकिन परिवेश की सीमाएं; संस्कार नाम की घुट्टी में पिलाई गयी भावना तथा मेधा के विकास के मंच और संसाधनों के अभाव में संभावनाएं, वास्तविकता में नहीं बदल पातीं। बच्चो के पास दैनिक जागरण और पूर्वांचल गाइड के अलावा पढ़ने को कुछ नहीं है, पुरातन, संकीर्ण सांस्कृतिक परिवेश सोच की समृद्धि में बहुत बड़का स्पीड-ब्रेकर है। जो नहीं कर-लिख पाया उसका ग्लानिबोध है, खेद नहीं है हर कोई जो कुछ चाहे एक ही जीवन में नहीं कर सकता और दूसरे जीवन की कहानी फरेब है। और इन सालों में, किसान-मजदूर-छात्र आंदोलनों से जुड़ाव ने मेरे गांव की परिधि बढ़ा दी है। पिछले 11-12 सालों में अपने गांव से अधिक तो उड़ीसा गया हूं वहां के किसान-आदिवासियों के जमीन आंदोलनों से जुड़कर लिखने के लिए और उनसे एकजुटता दिखाने के लिए।जब भी आज़मगढ़, जौनपुर, बनारस, इलाहाबाद जाता हूं तो घर जाने का मन होता है, लेकिन समयाभाव में मन मशोस कर रह जाता हूं। पहले जब पिताजी वगैरह थे तब अपने घर जाता था, अब गांव। गांव में मैं एक यात्री महसूस करता हूं, एक ऐसी जगह की यात्रा जहां कुछ परिचित लोग हैं, लेकिन यात्रा का समय इतना कम होता है कि परिचितों से दुआ सलाम के अलावा कोई सार्थक संवाद हो सके, जिनमें कइयों को मैं अजूबा लगता हूं। कई पूछते हैं मैं ऐसा कैसे हो गया? लंबी जीवन यात्रा में दुनिया को तथ्य-तर्कों के आधार पर समझने की सायास आदत और इसकी शोषण-दमन की कुरूपता को समाप्त कर इसे खूबसूरत बनाने की चाहत के चलते। आजमगढ़ शहर पहली बार 2008 में बटाला हाउस 'एंकाउंटर' पर रिपोर्ट के लिए जनहस्तक्षेप-पीयूडीआर की टीम के सदस्य के रूप में गया। आजमगढ़ जिला बताने पर लोग शहर की बातें पूछते हैं, जो मैं जानता नहीं। और जरूरी काम करना था, लेकिन अपने प्रिय बच्चों से संवाद भी जरूरी काम है, वैसे भी इसके अवसर विरले ही मिलते हैं। पिछली एक दिन की यात्रा में तुम्हारी कुटी में रामानंद से संक्षिप्त संवाद सुखद था। अगली यात्रा में कुछ दिनों की गुंजाइश लेकर जाऊंगा। सुदूर आत्मावलोकन में पाता हूं कि बचपन से ही ऐसा ही हूं, तुमको तो याद नहीं होगा, शायद पैदा भी नहीं हुए थे, मेरे दादा जी पंचांग और कर्मकांड के प्रति कट्टर थे। 1967 में 12 साल की उम्र में 8वीं की बोर्ड परीक्षा देने खुरांसो जाना था, पैदल। साइत रात 12 बजे थी, रात भर ऊबड़-खाबड़ रास्ते पार करते, (बीच-बीच में बाबा कंधे पर उठा लेते) 6 बजे खुरांसो पहुंचे, 7 बजे से परीक्षा थी। नंबर अच्छे आ गए, साइत की सार्थकता की अवधारणा भी 'सत्यापित' हो गयी। 13 साल की उम्र (9वीं कक्षा) तक मुझे शरीर पर जनेऊ की व्यर्थता का भान होने लगा और उतारकर फेंक दिया। जौनपुर पढ़ता था घर आता, बाबा मंत्र पढ़कर फिर से पहना देते, वापस बिलवाई गाड़ी पकड़ने जाते समय, लिलवा ताल की बाग में मैं किसी पेड़ में टांग देता कि कोई डोरा का इस्तेमाल कर लेगा, यह भी जानता था कोई करेगा नहीं क्योंकि दिमाग में टोटका-टोना का भय होता था। तुम्हारे पिताजी, लालू भाई, दामोदर, बाढ़ू, राजेंद्र, लालजी, भगवती, बहाल ( अकबाल यादव का भाई था, बहुत कम उम्र में किसी व्याधि के शिकार हो गए), भग्गल(स्व), मिलन, जगदीश, जयराम, ........ मेरे समउरी थे। ये सब बाबा के बारे में बताएंगे। मेरे अग्रज, आदित भाई, रविंदर... एक सीढ़ी ऊपर के। इनमें सो कोई भी इंटर से आगे नहीं पढ़ा। रमाकर ने हाईस्कूल के बाद कानपुर से आईटीआई किया। तुम्हारी दादी की अकाल मृत्यु से तुम्हारे पिताजी दोनों भाई शाहपुर में रहते थे, उनसे कम मुलाकात होती थी। विद्रोह की चेतना और साहस इतना नहीं था कि पहनने से इंकार कर देता। उन्होंने खुद ही, लाइलाज समझ बंद कर दिया। बाबा के नियमों का सबसे अधिक उल्लंघन करता था लेकिन सबसे अधिक प्यार भी मुझको ही करते थे (मुझे ऐसा लगता है)। दर-असल मैं छुट्टियों में घर आता था। दूर जाता रहा, घर की यात्राएं कम होती रहीं। वे बाग में (पहले रहट, फिर ट्यूबवेल पर) अपनी कुटी में ही रहते थे घर सिर्फ दोपहर और रात में भोजन करने आते थे। मुझे भी खेत-बाग घूमना पसंद है। जब चौराहे की चाय की अड्डेबाजी करने मिल्कीपुर/ पवई/परकौलिया न गया तो पूरी शाम बाबा के साथ उनकी कुटी पर बिताता। वे मुझे प्हयार से पागल कहते जो कालांतर में मेरा नाम पड़ गया। 1975 में गौना के बाद जब मेरी पत्नी आयीं तो उन्हें शक हुआ कि कहीं उनकी उनकी शादी धोखे से किसी पागल से हो गयी। वैसे भी लीक पर न चलना पागलपन ही माना जाता है। एक दिन उन्होंने अइया से पूछ ही लिया था।

कुछ अच्छा पर अप्रत्यासित करता तो बाबा बोलते 'पगला केहे होई'। (तुमने तो बेटा यादों के झरोखे में ऐसा फंसा दिया कि बाकी कामों को इंतजार करना पड़ेगा) दुर्भाग्य से विरासत में मिले छोटे-बड़े के संस्कारों के चलते हमारे परिवारों में दो पीढ़ियों में संवाद की परंपरा नहीं है। 11वीं क्लास में अपने बड़के बाबू से किसी बहस में उलझ गया और एकबैग मेरी अच्छे बच्चे की छवि चकनाचूर हो गयी। बाबा से संवाद में मिले खजाने को कभी मौकै मिला तो लिपिबद्ध करूंगा, खासकर 1945-46 में रंगून से ढाका होते हुए, कलकत्ता पहुंचने का उनका यात्रा विवरण। बाबा कई पार कहते जो मैं पढ़ रहा हूं। मैं 11वीं में था, मुझे लगता था मैं तो फीजिक्स, कमेस्ट्री किस्म के विषय पढ़ता था। एक बार कोर्स की टैगोर की एक कहानी (अंग्रजी में) सुनाया, उन्हें अच्छा लगा। बाबा को जब पंचांग की गणनाओं; सब्जी के खेत की निराई; सब्जी तोड़ने-छिलने-काटने आदि कामों से फुर्सत होती तो वे रस्सी बुनते या तकली पर जनेऊ। आम के सीजन में तो उनकी खाट बड़की बाग में एक खास पेड़ के नीचे होती थी। उस पेड़ का नाम ही बाबा वाला पड़ गया।

एक सुबह मैं नदी के तीरे लोनियाना के इस पार तक घूमकर, उस पार गोखवल पर नजर डालकर, बरास्ता मीरपुर मैं बाग में पहुंचा तो जनेऊ कात रहे थे तो मेरे मन में आया, आज उन्हें तकली की गति के हवाले उन्हें गुरुत्वाकर्षण और आवर्ती गति के न्यूटन के सिद्धांत के बारे में बताऊं। मैंने बाबा से पूछा कि उनकी तकली एक निश्चित परिधि में ही क्यों घूमती है? थोड़ा इधर-उधर क्यों नहीं जाती? उन्होने कहा गोल घूमेगी तभी तो सूत कताएगा। पेड़ की डाल पर कुछ टंगा था मैंने उसे खींच-छोड़कर बाबा से फिर पूछा, यह इतनी दूर से इतनी दूरी में ही क्यों घूमता है, इधर-उधर क्यों नहीं जाता। उनकी सारी व्याख्या ईश्वर की माया और इच्छा पर आधारित थी। लेकिन मेरी बातें चाव से सुन रहे थे और टोक रहे थे। मुझे जो लगता था कि वे अपनी मान्यताओं के गलत साबित होने पर उनके गुस्से पर पोते की चीजों की व्याख्या करने की कला पर खुशी में दब जाती थी। घर मैं अकेला बालक था जिन्हें उनकी गुस्से की डांट कभी नहीं खानी पड़ी। हां मुझे चौराहे की अड्डेबाजी से लौटने में ज्यादा देर होने लगती तो खूब गुस्सा होते लेकिन मेरे पहुंचने का बाद नहीं। उस दिन की चर्चा में इतनी देर हो गयची कि बाबा के नदी नहाकर भोजन करने का वक्त हो गया। बाबा को पृथ्वी का आकार और गुरुत्वाकर्षण शक्ति, आवर्ती गति तथा न्यूटन के गति के नियम बताया। बाबा को नई बातें सुनकर मजा आ रहा था। उठते हुए बोले, “का रे पगला, न्यूटनवा भगवानौ से बड़ा है का?” मैंने कहा “नाहीं बाबा वतना त नाय लेकिन तब्बौ बहुत बड़ा रहल”। बाबा घर से ले आया हुआ खाना नहीं खाते थे, ले आने में रास्ते में अपवित्र हो सकता था। किसी शाम घर जाने का मन नहीं हुआ तो वहीं अहरा लगाते और पौत्रबधुओं की दावत और पिकनिक हो जाती।   

वापस बचपन तथा जनेऊ की कहानी पर आते हैं। जो भी लिख रहा हूं, वह अपने पिताजी समेत मेरे किसी भी समकालीन से सत्यापित कर सकते हो। हम लोग 'चौबे क निमिया के नीचे' (जहां अब मंगला भाई और जंगबहादुर भाई की गोशालाएं हैं) आमने-सामने खाट पर बैठे थे। मैंने पशीने से परेशान होकर बनियान निकाला, मंगला भाई ने कहा, 'ये बच्चा, ब्राह्मण बालक की खाली पीठ अच्छी नहीं लगती’। मुझे शब्दशः याद है, "मंगला भाई, ब्राह्मण होने में मेरा क्या योगदान है, 100 फुट दक्षिण पैदा होता तो अहिर होता और 100 फुट उत्तर (बेगीकोल) तो लोहार"। पुरुखों की परंपरा का तर्क, मैं माना नहीं कि जरूरी नहीं कि हमारे पूर्वज हमसे अधिक बुद्धिमान रहे हों। बल्कि हर अगली पीढ़ी तेजतर होती है, तभी मानव पाषाण युग से साइबर युग तक पहुंचा है।

जिन  समौरी (हमउम्र) समकालीनों का जिक्र किया है उनमें दामोदर को छोड़कर सब मुझसे 2-4 महीने बड़े थे। जयनारायण(स्वर्गीय) मुझसे एक-डेढ़ साल ही छोटे थे तो मां-दादी का ध्यान ज्यादा उधर ही रहता। मैं कम उम्र में ही भइया की पूछ पकड़कर स्कूल जाने लगा। गदहिया गोल में ही मुझे संख्याओं के खेल में मजा आने लगा। मुझे पहाड़ा याद नहीं हुआ समझ आ गया। पंडित जी (स्व. श्री सीताराम मिश्र) ने पता नहीं क्या प्रतिभा देखी कि गदहिया गोल से 1 में कर दिया। 3 क्लास रूम थे 3 टीचर और छः कक्षाएं। कक्षाओं का बंटवारा वरिष्ठता के क्रम में था। गदहिया गोल और कक्षा 1 पंडित जी पढ़ाते थे; कक्षा 2 और 3 बाबूसाहब (बासुदेव सिंह, बेगीकोल के) तथा 4 और 5, प्रधानाध्यापक, मुंशीजी (अड़िका के मुंशी राम बरन)। कक्षा 2 और 3 पूरे साल साल भर पढ़ा। कक्षा 4 में पहुंचने पर मुंशी जी रिटायर हो गए और बाबू साहब प्रधानाचार्य हो गए और कक्षा 4 और 5 पढ़ाने लगे जो एक ही कमरे में एक ही कतार में बैठते थे। लालू भाई उस समय कक्षा 3 में थे। कक्षा 5 में अड़िका के जय राम और श्रीराम यादव थे अपने गांव के रविंद्र उपाध्याय और रमाकर थे, एक दो लड़के गोखवल और बखरिया के थे और शायद एकाध अपने गांव के और। कुल 8-9 छात्र थे। कक्षा 4 में मैं, महिंदर सिंह, भगवती धोबी, जगदीश सिंह, राम बहाल यादव कुछ चकिया और बखरिया के लड़के थे। कक्षा 4 से 5 में प्रोन्नति की कहानी अपने बच्चों को सुनाता हूं तो उन्हें किंवदंति लगती है। डिप्टी साहब (यसडीआई) मुआइने पर आए थे। कई दिनों से स्वागत की तैयारी हो रही थी। चाय-पानी के बाद हमारे क्लास में आ गए। जहां कक्षा 5 की कतार खत्म होती थी वहीं से 4 की शुरू। मैं दोनों कतारों के विभाजन विंदु पर बैठता था। डिप्टी साहब ने अंकगणित का कोई सवाल पूछा। कक्षा 5 वाले सारे चुपचाप खड़े होते गए। मेरे लिए सवाल बहुत आसान था, चटपट उठकर बता दिया। डिप्टी साहब ने पीठ ठोंका और बाबू साहब ने कहा कि मैं तो अभी कक्षा 4 में था, डिप्टी साहब ने कहा, “इसे 5 में करो। मैं अगले दिन भाषा और गणित की किताब और गोपाल छाप 2 नोटबुक लेकर कक्षा 5 की कतार में सबसे आगे बैठ गया। सभी क्रोध से देख रहे थे लेकिन कुछ बोले नहीं। बाबू साहब आए तो वहां बैठने के लिए डांटने लगे और अपनी पुरानी जगह पर जाकर बैठने को कहा। लेकिन मुझे लगा कि जब डिप्टी साहब ने कह दिया तो इन्हें नहीं रोकना चाहिए। मैंने कहा, “जब डिप्टी साहब कहि देहेन त अब हम पांटै में पढ़ब”। वे बोले, “मिडिल स्कूल जाए के लग्गूपुर पढ़ै जाब्य, त भेंटी भर क हय सलारपुर के बहवा में बहि जाब्या”। हम बोले, “चाहे बहि जाई चाहे बुढ़ि जाई, डिप्टी साहब बोल देहेन त अब हम पांटै मं पढ़ब”। और इस तरह मैं कक्षा 4 से 5 में चला गया। वैसे एक बार उस बाहा में मैं वाकई बहने लगा था। यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि मैं बचपन से ही थोड़ा चिंतनशील और अपने समकालीनों से ज्यादा सचेत था।
जारी....
18.11.2017
   



3 comments:

  1. इसमें बेटा-बेटी बेतरतीब 17 का रिपीट हो गया।

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  2. बहुत बचपन की कुछ बातें याद हैं, खासकर जिनका जिक्र लोग बाद तक करते थे। मेरी मुंडन पांचवे साल में हुई थी। आम तौर पर साल भीतर या तीसरे साल में सबकी हो जाती थी। दादा जी के पंचांग की गणना से मेरी मुंडन के ग्रह-नक्षत्रों का संयोग पांचवे साल में बैठा। मां या दादी के पास समय हुआ तो जूड़ा चोटी कर देती थी, कभी कभी कई दिन हो जाते तो लट पड़ जाती और बच्चे, बड़े भी मुझसे इमली हिलाने को कहते और मैं मगन होकर सर हिलाने लगता।कोई भी अपरिचित बिटिया बुला देता। अच्छा तो नहीं लगता था लेकिन सह लेता था। उम्र में बड़े कुछ लड़के लड़की कह कर चिढ़ते अच्छा तो वह भी नहीं लगता था लेकिन वापस उन्हें लड़की कहने के अलावा कुछ कर नहीं पाता था। उन दिनों स्त्रियां एक खास किस्म की चिकनी मिट्टी (नाम भूल रहा है) से बाल धोती थीं। एक दिन दादी ने उसी मिट्टी से मेरा बाल धोकर अच्छा सा जूड़ा बांध दिया। अनामत चाचा (दर्जी) उसी दिन सिलकर कपड़े दे गए थे। मैं खुशी-खुशी बगीचे में और बच्चों के साथ खेलने जा रहा था, अपने नए कपड़े भी दिखाने थे। बड़े भाई मुझसे 5 साल बड़े थे और छोटा डेढ़-दो साल छोटा। तभी रास्ते में साइकिल से आते एक व्यक्ति ने रोक कर पिताजी का (मेरा) घर पूछा, वह तो ठीक था, लेकिन उन्होने बेटी कह कर बुलाया था। मेरी छवि अच्छे बच्चे की थी, लेकिन अच्छे बच्चे की भी सहनशीलता की सीमा होती है, कभी-न-कभी ट्रीगरिंग प्वाइंट आना ही था। सीमा टूट गयी और मैंने उन्हे सप्रमाण बता दिया कि मैं लड़की नहीं लड़का था। उन्होने साइकिल खड़ी कर हंसते हुए मुझे गोद उठा लिया और सािकिल की सीट पर बैठा कर घर ले गए। बाद में उनसे बहुत दोस्ती हो गई। पिताजी के अच्छे दोस्त थे, अब शायद न हों, नाम याद है,चकिया के राम सुमेर यादव। यह अनुभव इसलिए शेयर कर रहा हूं कि 5 साल से कम लड़के के दिमाग में यह कहां से आता है कि लड़की होना गंदी बात है? लड़कियों को तो सब बेटा-बेटा करते रहते हैं वे खुश हो जाती हैं। मैं कभी बेटी को बेटा कह कर चिढ़ा था तो कहती थी 'तू-तू-तू बेटा', औरों से विनम्रता से कहती है, "Excuse me, I don't take it as complement." एक तीन या 4 साल के लड़के को बेटी कहे जाने पर इतना अपना क्यों महसूस होता है? लगता नहीं कि किसी ने कभी कहा होगा कि लड़की खराब होती है। बच्चे बहुत तीक्ष्ण प्रेक्षक और नकलची होते हैं, वे परिवेश से सीखते हैं, अनजाने में, बिना किसी सोचे-समझे प्रयास से वे सामाजिक मूल्यों को आत्मसात करते रहते हैं, जिसे हम संस्कार कहते हैं, मैं उसे acquired morality कहता हूं। इसी लिए संस्कारों को तोड़ना तार्किक, बौद्धिक विकास की अनिवार्य शर्त है। मैंने एक कविता (तुकबंदी) में लिखा है, 'मुझे अच्छी लगती हैं ऐसी लड़कियां, जो संस्कारों की माला जपते हुए नहीं, तोड़ते हुए आगे बढ़ती हैं'। मैं अपने स्टूडेंट्स से कहता हूं, "We acquire so many values, prejudices, dogmas and sense of morality during our growing up without our conscious will or effort, one needs to question and replace those moralities with rational ones, as the application of mind is species-specific attribute of the humankind." इसी को मैं कभी बाभन से इंसान बनने के रूपक के रूप में पेश कर देता हूं, तो लोग नाराज हो जाते हैं।

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